क्षत्रिय चारण

क्षत्रिय चारण
क्षत्रिय चारण

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

चारणाचार प्रश्नोत्तरी

1) चारणो मे नाम के अंत मे सिंह शब्द का प्रयोग क्यु होता है?
> प्राचीनकाल से चारण एक शासक जाती भी रही है (जागीरदार ) 30-40 बीघा भुमी से लेकर 30-40 गाँव तक के चारण के शासन क्षेत्र थे।
और राजपुत्रो के साथ कंधे से कंधा मीलाकर युद्ध भुमी लडकर तलवार को रक्त रंजीत कीया है।

और चारण एक क्षत्रिय समुदाय का अहेम हीस्सा है
सिंह शब्द अपने आप मे शूरविरता का प्रतीक है

ईसलीए चारण कुल मे नाम के अंत मे सिंह शब्द का प्रयोग होता है ।

2)चारणो मे सबसे ज्यादा गाँव की जागीर कीसके पास थी?
> सबसे ज्यादा 38 गाँवो की जागीरी (रजवाडा) मुंदीयाड ठाकुर साहब श्री करणीसिंहजी बारहठ(रोहडीया) के शासन क्षेत्र मे थे।

3) माँ करणी जी की मासीयाई बहेन का नाम क्या था?
>माँ करणी जी की मासीयाई बहेन श्री देवल माँ सिंहढायच थे,
जीनकी तीन बेटीया थी,

बुट ,बलाल ,बहुचर

 4) पूरे विश्व मे एसे कौनसे विर पुरुष  थे जीन्होने अधीक संख्या मे शेरो का शीकार कीया हो?
>श्री नरकेशरी चारणकुल भुषण नरसिंह जी सिंहढायच जीन्होने 200 से उपर शेरो का शीकार कीया था।

 5) महाभारत के बाद का सबसे बडा महाकाव्य कौनसा है?
> वंशभास्कर - महाकवि चारण सूर्यमल मीशण

 6)अकबर के समय मे चल रही नौरोजा प्रथा कीसने बंध करवाई थी?
>श्री राजल बाईसा जीन्होने अकबर की वाहीयात प्रथा नौरोजा बंध करवाया था।

7) महाराणा हम्मीर जी ने कीस देवी की मदद से चीतौड वापीस हासील कीया?
>श्री बरवडी माता जीन्होने राणा हम्मीर को 500 घोडे और सेना सहीत चीतौड जीतने का वरदान दीया और राणाजी ने चीतौड फतेह कीया।

8) वो कोनसे विर योद्धा चारण थे जीनका सर कटने के बाद भी धड दुश्मन से लडता रहा?
>श्री महाविर नरुजी सौदा जीन्होने बडी विरता से युद्ध लडा और जीनका सर कटने के बाद भी धड दुश्मन से लडता रहा!!

 9)आमेर के शासक सांगा का वध कीसने कीया था?
शूरविर चारण कानाजी आढा जीन्होने अपने मीत्र अमरचंदसिंह नरुका के मृत्यु का वैर लेने के लीए आमेर के महाराजा सांगा का वध कीया था!!

जयपालसिंह(जीगर बऩ्ना) थेरासणा

सिंहढायच वंश का उदभव

पंवार वंशीय राजा समजी रो बेटो कविदासजी आवड माताजी री आग्या सूं चारण बणग्यो।इण कविदास री पांचवी पीढी में भाचलियोजी (जो उणरे जागीर ग्राम भाचली रे नाम सु भाचलीया कहेलाए) होया अर उण री वंश परंपरा मे नरसिंहजी होया। नरसिंह भांचलिया साहसी ,वीर अर वाकपटु चारण हा।उण दिनां मंडोवर माथै नाहड़राव पड़िहार राज करै। बात चालै कै कपिल मुनी रै श्राप सूं एकर पुस्कर तल़ाब सफा सूखग्यो।पाछो भरीजै ई नीं जणै किणी कैयो कै कोई ऐड़ो आदमी जको घणा सिंह मार्या वे यो आदमी पुन्न आपनै इण तल़ाब माथै संकल़पै तो ओ तल़ाब भरीज सकै।राजा पतो करायो तो ठाह लागो कै एक चारण नरसिंह भांचल़ियो ऐड़ो विर प्रतापी पुरूष है।

कैल़ाशदानजी ऊजव्वल़ लिखै-

*साप कपिल मुनी सूखियो,*
*पुस्कर राज प्रसिद्ध।*
*पाणी पाछो प्रागल़ै,*
*समप्यां पुनि सिंघ वध्ध।।*
नाहड़राव आदमी मेल नरसिंह नै तेड़ायो।नरसिंह आयो अर जनहित में गौमार सिंह मारण रो पुन्न राजा रै नाम संकल़पियो-
*ताकव तुरत तेड़ावियो,*
*सह नाहड़ सन्मान।*
*सिंहढायच आयो सुभट,*
*दियण तीर्थ हित मान।।*
 नरसिंह रे प्रतापी वर्चस्व अर तेजस्वी उणियारै सूं नाहड़राव प्रभावित होयो अर इणनै आपरो दरबारी बणाय 12 गांमां सूं मोगड़ो  दियो-
*भांचल़ियो नरसिंघ भण,*
*पुस्कर कियो पड़ाव।*
*विरद सिंढायच भाखियो,*
*राजा नाहड़राव।।*
नरसिंह री संतति आपरै दादै सिंढायच लारै कालांतर में सिंढायच बाजी।
इणी ऊजल़ै वंश में आगै जायर बाणजी होया अर बाणजी रा बेटा हरिदास सिंढायच होया।
हरिदास सिंढायच रै एक दूहै माथै महाराज पदमसिंह बीकानेर नौ लाख री हुंडी भरी-
*रघुपत काय न रखियौ,*
*ऐक पदम आराण।*
*पाण अठारै पदम रै,*
*कर तौ वल़ केवाण।।*
बात चालै कै जद हरिदास इतरो धन लेय घरै गया तो उणां री जोड़ायत इचरज में पडती पूछियो कै "कांई कोई चिंतामणी हाथ आयगी कै कोई पारस मिलग्यो कै  राम मिलग्यो कै जदुपत किसन भेटियो कै लंका लूटली आद आद रै साथै उणां कैयो कै ऐ सगल़ी नै होई तो सेवट म्हनै लागै कै महाराज पदमसिंह रीझग्या!!इण भावां नै किणी कवि आपरै शब्दां में पिरोवतां लिखियो -
चितामण कर चढे,
किना पारस्स परस्सै।
मिल़िया रघुपत राय,
किना जदुपत दरस्सै,
लूटी  लंक कनंक,
किना लखमीवर तूठा।
भोल़ैनाथ भंडार,
दिया लूटाय अलुटा।
तूठा कुमेर वूठा वरुण,
अणखूटा धन आविया।
(कन( राजा पदम रीझाविया।।
सिंढायच हरिदास आपरी बखत रा मोटमना अर दातार मिनख हा।उणां दातारगी री घणी छौल़ां दी।किणी मोतीसर कवि लिखियो कै -जस दातारगी री दवा रै अभाव में ऐड़ो  बीमार पड़ियो कै ऊभो ई नीं होय सकियो सेवट उणनै हरिदास  धनंतर रो रूप धार दातारगी  री ओखद सूं निरोग कियो-
*मांदो जस महलोय,*
*पड़ियो दत ओखद पखै।*
*हरि धनंतर होय,*
*बैठो कीधो बाणउत।।*गिरधरदानज रतनू दासोड़ी

चारणी शक्ति श्री राजबाई माता

आई श्री राजल माता  🙏🏻

*बोले न बादशाह काई थर थर धुजत अंग,
सिंहणी दियण डंणक रंग माँ राजल रंग*
अंकित भान चारण कृत
💥राजल माता द्वारा अकबर से नवरोजा छुडवाना💥
बीकानेर की संस्थापिका देवी करणीजी वि स १५९५ चैत सुदी नवमी को ज्योतिर्लीन हो गये। इनके ज्योतिर्लीन के ठीक दस मास पश्चात् यानि वि स १५९५ को माघ मास के शुक्ल पक्ष में सौराष्ट्र प्रान्त के ध्रांगध्रा तालुका के चराडवा गांव में वाचा शाखा के चारण उदयराज के घर राजबाई माता का जन्म हुआ। ये राजबाई राजल माता के नाम से करणी जी के पूर्णांवतार के रूप में जानी जाती है ।
१९३८ ईस्वी सन् को प्रख्यात इतिहासकार किशोरसिहजी बाहर्स्पत्य ने श्री करणीचरित्र ग्रंथ लिखकर बीकानेर महाराजा गंगासिह को समर्पित किया। लेखक के उक्त ग्रंथ को लिखने का एक मात्र कारण यह रहा था जो आजकल हमें व्हाटसप पर किरणदेवी नामक कल्पित पात्र द्वारा अकबर से नवरोज छुडवाने का प्रचार प्रसार करके अपने गौरव में श्री वृद्धि करके देवी राजल माता के ऐतिहासिक चरित को कमत्तर करने का प्रयास कर रहे है।
नवरोजा प्रथा 👉एक ऐसा राजपूताने का दाग था जिसे आई  श्री करणी माता के पूर्णांवतार राजल माता ने अपने दैविक शक्ति द्वारा समाप्त किया था और अकबर के इस लम्पट आचारण से राजपूताने को मुक्ति दिलवाई। जिसकी पुष्टि स्वंय पृथ्वीराज के सोरठे, दयालदास की ख्यात २ पृ १३४-३५,वाचा चारणों के रावल की बही,मुंशी देवी प्रसाद के ग्रंथ राज रसनामृत,डा लुइजिपिओ तैसिस्तोरि,रावत सारस्वत, राजवी अमरसिंह आदि के ग्रंथों से व सैकडों डिंगल रचना से इसकी पुष्टि होती है।
पृथ्वीराज राठौड बीकानेर के राव कल्याणमल का पुत्र था जो उच्चे दर्जे का भक्त कवि था ।अकबर के दरबार में रायसिंह व पृथ्वीराज राठौड दोनो को उचित स्थान था।पृथ्वीराज राठौड महाराणा प्रताप का मौसेरा भाई था। रायसिंह को अकबर ने सौराष्ट्र प्रान्त का प्रशासक नियुक्त किया था एक बार पृथ्वीराज सौराष्ट्र जा रहा था तब रास्ते में चराडवा गांव में उसका घोडा मर गया तभी वहा से गुजर रही दस वर्षीय बालिका राजल माता ने चमत्कारी ढंग से मृत घोडे को पुन:जीवित कर दिया।पृथ्वीराज देवी अवतार राजल माता को प्रणाम करके भविष्य में होने वाले संकट में मदद करने का वचन मांगा।राजल माता ने कहा जब भी तुम्हें संकट आये मुझे याद करना मै तुम्हारी मदद करूंगी।

पृथ्वीराज का विवाह जैसलमेर के हरराज भाटी की पुत्री छोटी पुत्री चम्पा कुंवरि के साथ हुआ था ।हरराज भाटी की बडी पुत्री नाथी बाई का विवाह अकबर के साथ हुआ।अकबर ने अपनी रानी नाथीबाई से चम्पा कुंवरि के रूप सौन्दर्य की बात सुनने पर वह उसे प्राप्त करने के लिए लालाहित हो उठा।उसने षंडयंत्रपूर्वक नवरोज के त्योहार में चम्पाकुंवरि को बुलवाने का आदेश दिया।पृथ्वीराज उसके आचरण से वाकिब था अकबर ने छलबल से उसका डोला अपने महल में बुला दिया।पृथ्वीराज अकबर की मनोइच्छा को भांप गया और उसने इस संकट की घडी में राजल माता को याद किया और अपने ऊपर आये संकट को निवारण करने की प्रार्थना की।
पृथ्वीराज का कहा सोरठा इस प्रकार है।
बाई सांभल बोल ,
कमधां कुल मेटण कलंक।
करजे साचो कोल,
ददरैरे दीधो जिको।
पृथ्वीराज की पुकार सुनके देवी राजल माता आगरा में प्रकट हो गये ।अकबर ने जैसे ही डोले की कनात हटाई तभी राजल माता सिंह रूप में प्रकट होकर अकबर का कंठ पकड लिया।तभी अकबर ने अपने प्राणों की भीख मांग दी और राजल माता को कहा कि मै आपकी गाय हूं मुझे माफ कर दो ।तब राजल माता ने उसे भविष्य में अपने आचरण को  सुधारते हुए नवरोज प्रथा को बंद करने के वचन देने पर अकबर के प्राण बख्शे। राजल माता के नवरोज छुडवाने पर ओंकारसिंहजी लखावत द्वारा लिखित पुस्तक को पढकर अपने भ्रम को दूर करे।
जय राजल माता
इसे अधिकाधिक शेर करके सभी तक सही जानकारी पहुंचाये।
✍डो. नरेन्द्र सिंह जी आढा
ठि.श्री देवल कोट झांकर
इतिहास व्याख्याता रा उ मा वि घरट सिरोही

भूचरमोरी युद्ध के विर योद्धा चारण

चारण माने चाह+रण........................

>गरासदार गोपालदासजी बारहठ व विर परबतजी वरसडा


जामनगर के जामसताजी ने संवत् 1639वि.को अहमदाबाद के 'मुजफ्फर शाह' बादशाह को शरण दे दी। अकबर ने ईसे लोटाने को कहा परन्तु सताजी ने शरणागत की रक्षा का अपना धर्म समझते हुए वापिस देने से मना कर दिया। इस पर अकबर के सूबेदार मिर्जा अजीज कोका को जामनगर पर सेना देकर भेजा।
नवानगर (जामनगर) के महान वीर चारण परबतजी वरसङा ने जामनगर के प्रत्येक गाँव में जाकर वीरत्व का बोध कराते हुए नवयुवकों की सैन्य टुकङी तैयार की । और नागङा वजीर के नेतृत्व में युद्ध क्षेत्र को प्रयाण किया और परबतजी वरसडा विरता से लडकर विरगति को प्राप्त हुए।अकबर की भारी सेना से यह एतिहासिक युद्ध 'भुचर मोरी' की समर भुमि मे लङा गया। दुसरी ओर महात्मा ईसरदासजी बारहठ के पुत्र 6 ग्रामो के गरासदार गोपालदासजी बारहठ अपने परिजनों सहित अन्य पाँच सौ तूम्बेल चारणो की टुकङी का स्वयं नेतृत्व करते हुए, विर चारणो की सेना को लेकर समर भुमि मे पहुचें।
इस युद्ध में अकबर की सेना से अप्रतिम वीरता से लङते हुए इन चारणों ने शत्रुओं का भारी विनाश किया ओर खून की बहती धारा में इन्होने मरण को वरण किया। इन चारण वीर योद्धाओं के पराक्रम को देखकर " मिरजा अजीज कोका" ने कहा ,जेमने पासे आवां चारणों छै' तेने आपणे केवी रीते जीती शकीशुं ? धन चारणो ने जेमणे पोताना धणीनुं नमक उजाली पृथ्वी पर पोतानुं नाम अमर कर्यु।"  कुल मीलाकर 1100 चारण ईस युद्ध मे विरता से लडकर शहीद हुए।
इस युद्ध में सताजी के पुत्र अजाजी रणखेत रहे। जिनकी पाग लेकर गोपालदासजी बारहठ ने राणी को सुपुर्द किया, जिसके साथ राणी भूचर मोरी के रणक्षेत्र में आकर सती हुई। गरासदार गोपालदास बारहठ के शरीर पर 52 घाव लगे हुए थे । इसलिए वह भी कुछ देर बाद विरगति को प्राप्त हुए । आज भी भूचर मोरी के युद्ध मैदान मे इस विर बारहठ का "पालिया" (चबुतरा) बना हुआ है।जो इसकी वीरता के गीत गाता हुआ इसकी साक्षी दे रहा है।

पीठवा चारण और जैतमाल राठोड

*पीठवाचारण और जैतमालराठौङ !!*
_______________________________
     *!! दोहा !!*

*पावन हूवौ न पीठवौ,*
*न्हाय त्रिवेणी नीर !*
*हेक जैत मिऴियां हूवौ,*
*सो निकऴंक सरीर !!*

पीठवा नामक चारण कुष्ठ रौग से पीङित होकर, इस कुष्ठ रोग से बहुत ही दुःखित होकर उससे छुटकारा पानेके लिए कितने ही तीर्थादि कर आया परन्तु उसका रोग नही गया ज्यों ज्यों दवा की मर्ज बढता ही गया ! उसने सुना कि रावल मल्लीनाथ का छोटाभाई सिवाणां का राजा जैतमाल जो कि भगवान का बङा भक्त था उसके स्पर्श से कोढ रौग दूर हो सकता है, एक दिस दैवयोग से पीठवा जैतमाल के गढमें  पंहुंच गया, *राव जैतमालजी* ज्योंहीं आ कर मिलने को बांह बढाई तो,पीठवा पीछे सरक गया और बोला कि मैं कुष्ठी हूं मेरा सरीर बिगङा हुआ है,मैं महापापी पातकी आपसे कैसै मिल सकता हूं मैंने इस दुःख से छूटने के लिए अनेक तीर्थों के साथ ही प्रयागराज तक स्नान कर लिया है परन्तु मेरे कर्मों का फल नही मिटता है, उसके ऐसै दीन और करूणामय वचन सुनकर जैतमालने कहाकि तुम डरो मत, मुझसे गले मिलो, यदि सनातन धर्म में मेरी दृढ आस्था व श्रध्दा है तो तुम्हारा शरीर सारा निष्कलंक हो जायेगा !!
*बस कहने मात्र की देरी थी, पीठवा का शरीर रोगमूक्त हो गया !!*
उसने *रावजैतमाल को दसवांसालिग्राम*
विरूद से विभुषित किया ! इस विषय में एक प्राचीन कविता की पंक्ति निम्नप्रकार है किः...........
*!!दसमौ साऴग्राम सदैवत,दिनतिण पीठवै विरद दियौ !!*

इस ईकिसवीं सदी में सब बातें व मर्यादा को भूल बिसरा दी है तो भी आज भी उस बात को जानने वाले चारण जब यदाकदा जैतमालोतों से मिलते समय दसवां साऴ ग्राम का स्मरण अवश्य ही करते हैं !!

*गीत पीठवा चारण रो!*
              *!! दोहा !!*
*तीर्थतीर्थ तोय,अड़सठ में अबगाहिया !*
*जेत कमधग्यो जोय,कनवोजे मेट्यो कलंक !!*
               *!! गीत !!*
*पण ग्रहियो जेत मिलन कज पातां,*
*ऐह ईखियातो जगत अछै !*
*अड़सठ तीर्थत पहल अवगाहे,*
*पीठवो गयो सिवयांण पछै !!*  !!1!!

*अधर रूधर चवन्तो आचो,*
*काचो देख हियों कम्पै !!*
*सलख सोमह भ्रम घणा हैत सूं,*
*जेत मिलण कज आव जपै !!*   !!2!!

*इहंग इम कहियो अन्नदाता,*
*अमो कमल नह भाग इशो !*
*सारो रषी बहै तन सड़ियो,*
*कहो मिलण रो बेत किसो !!*    !!3!!

*कहतो हसे मलफियो कमधज,*
*जग अचर जियो देख जुवो !*
*बांह ग्रहे मिळतो सुख बुझत,*
*हेम सरीखो शरीर हुवो !!*   !!4!!

*धिन धिन कहै पृथ्वी बड़ धारण,*
*काट कलंक निकलंक कियो !!*
*दसमो सालगराम सुदेवत,*
*दिनजिण पीठवे विरद दियो !!*  !!5!!
_______________________________   
राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर (राज.)

गरासदार

"गरासदार" शब्द का मतलब


> 'गरास' या 'ग्रास' का संस्कृत में अर्थ है निवाला (खाने का निवाला)।

किसी राज्य में शूरविर और विध्वान प्रतिष्ठीत व्यकित जो उस राज्य के दरबारी होते थे,उनको उनकी शूरविरता व विध्वानता की एवज मे गांव या जमीन-जागीर दी जाती थी।

जागीरदार व तालुकदार ये दो शब्द गरासदार शब्द के ही पर्याय है।

>गरासदार का सिधा मतलब है की हम उस राज्य का कुछ हिस्सा मतलब पूरा नहीं ऐसा एक निवाला (ग्रास)खा रहे है (पूरी रोटी का एक निवाला)।

>ये गरासदार शब्द सिर्फ गुजरात के काठीयावाड(सौराष्ट्र) मे ही प्रचलीत है।

>आगे जाकर ग्रास शब्द जमीन-जागीर के लिए इस्तमाल होने लगा और जो ग्रास (जमीन) वाले होते हैं उन्हें गरासदार कहा गया।
> गरासदार उन्हींको कहा जाता है जो किसी रजवाड़े से जमीन-जागीर लेकर उतरे हो,और वह सिर्फ राजपूत,चारण व काठी दरबार ही होते थे।

जयपालसिंह(जीगर बऩ्ना) चारण ठि.थेरासणा


नोंध:- ईस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेर करे परंतु मेरे नाम के साथ छेडछाड ना करे।

चारणो की एक विर शाखा सौदा बारहठ

राजपूताना और गुजरात मे सौदा बारहठ शाखा के चारणो के जागीर ग्रामो(स्वशासीत ग्राम/शासन जागीर) की जानकारी

>महाराणा हम्मीर जी ने बारुजी सौदा को अपने दसोंदी नीयुक्त कर 25,000 की वार्षीक आय का *आंतरी* सहीत 12 ग्रामो का पट्टा जागीर मे दीया। सौदा बारहठ की पदवी से विभुषीत कर दोवडी ताजीम,पैरो मे सोने के लंगर, बाह पसाव,उठण बेठण रो कुरब,पालकी, चंवर, सोने चांदी के जवेरात, हाथी -घोडे, शस्त्र, ईत्यादी सन्मानो से नवाजा। बारुजी सौदा शाख के मुल पुरुष है।

> महाराणा हम्मीर जी ने बारुजी के पुत्र बाजुडजी को 50,000 आय वाला कपासन परगना जागीर मे देकर दरबारी सन्मान दीये।

>ठाकुर बाजुडजी ने अपने तीनो पुत्र(कौलसिंह,करमसेनजी,बेलाजी)  कौलसिंह को आंतरी की जागीर,करमसेनजी को बीकाखेडा,और बेलाजी को मावली की जागीर दी।आज ईन के वंशज ईन ठीकानो के जागीरदार है।

>ठा.बाजुडजी के पुत्र बेलाजी के पुत्र कुँ.राजारामसिंह सौदा को महाराणा उदयसिंहजी ने ओडा नामक ग्राम जागीर मे दीया।राजारामसिंहजी सौदा ने कुंभलगढ की लडाई मे विरगती प्राप्त हुए।

>राजारामसिंहजी सौदा के पुत्र लुंभाजी को महाराणा प्रताप ने तलाई नामक ग्राम जागीर मे दीया।

बारुजी की छठ्ठी पीढी मे पालमजी सौदा हुए जीनको महाराणा रायमल ने सन्मानीत कर दरबारी कुरब कायदे सहीत आलीशान सेणोंद/सोनीयाणा ग्राम जागीर मे दीया। विर पालमजी चीतौडगढ के पाडीपौल पर विरता से लडते हुए विरगती को प्राप्त हुए। *ईसी सोनीयाण जागीर के दो शूरविर चारण सिरदार ठा.जैसा सौदा व ठा.केशव सौदा प्रसिध्द्ध हल्दीघाटी युद्ध मे महाराणा प्रताप की सेना के महानायक थे!!! जीन्होने बहोत से दुश्मनो के सर काट कर विरगति का वरण कीया था।


> पालमजी सौदा के पुत्र जवणाजी महाराणा सांगा का मोहंमद खीलजी के साथ हुए युद्ध मे हरावल टुकडी मे रहकर विरता से लडते हुए रणखेत रहे। जवणाजी के पुत्र ठाकुर राजविरसिंह को महाराणा प्रताप ने बडला ग्राम जागीर मे दीया ,दरबारी कुरब कायदे दीए।

>ठाकुर राजविरसिंह जी सौदा के पुत्र कुँ खेमराजसिंह जी को देवगढ के रावत संग्रामसिंह जी ने डीडवाणा नामक ग्राम जागीर मे देकर दरबार मे स्थान दीया।

>खेमराजसिंह सौदा के पुत्र केशरीसिंह को महाराणा राजसिंह प्रथम ने पाणेर ग्राम जागीर मे दीया।

>बारुजी की नौ वी पेढी मे देवीसिंह जी को विक्रम संवत 1657 मे ईडर शासक राव कल्याणमलजी ने टोकरा सहीत 3  ग्राम का पट्टा जागीर मे देकर अपने दरबारी कुरब कायदे प्रदान कीए।

>विक्रम संवत 1652 मे डुंगरपुर रावल आसकर्ण ने ठाकुर नाग जी सौदा को बरछावाडा ग्राम जागीर मे दीया।

>विक्रम संवत 1713 मे डुंगरपुर रावल खुमानसिंह जी ने ठाकुर हाथी जी सौदा को हरौली ग्राम जागीर मे दीया ।

> विक्रम सवंत 1791 मे डुंगरपुर रावल शिवसिंह जी ने ठाकुर कुशालसिंह जी सौदा को करावाडा ग्राम जागीर मे दीया।

डुंगरपुर महारावल उदयसिंह जी ने ठाकुर जगतसिंह जी सौदा को 11 ग्रामो का पट्टा जागीर मे दीया, करावाडा को मीलाकर कुल 12 ग्रामो का उमराव ठिकाना हुआ ईन 12 ग्रामो के पट्टे का करावाडा पाटवी ठिकाना बना।

ठाकुर जगतसिंह जी का डुंगरपुर रीयासत के प्रतीष्ठीत दरबारी उमराव सिरदारो की श्रेणी मे स्थान था। दोवडी ताजीम जागीरदार का उमराव पद, पालकी और चंवर का सन्मान, हाथी तथा पैरो मे सोने के लंगर  ईत्यादी फीताब एवं कुरब कायदे डुंगरपुर दरबार से एनायत हुए थे।


>बारुजी की नवमी पीढी मे शुरविर नरुजी सौदा को महाराणा राजसिंह ने दरबार मे उमराव पद एंव राजकीय सन्मान के साथ राजसभा सद (मुसाहब) का पद देकर पालखी और चंवर का अधीकार दीया,जो आमात्यो को ही प्राप्त होता था!

>संवत 1736 मे उदयपुर पर औरंगजेब के आक्रमण समय जब महाराणा समस्त प्रजा सहीत पहाडो मे चले गए तब शूरविर नरुजी सौदा ने उदयपुर छोडना स्वीकार नही कीया। राजद्वार और जगदीश मंदीर की रक्षार्थ हेतु औरंगजेब के ईक्के(प्रमुख सैनीक) ताजखाँ और रुहीलखाँ का सामना करते हुए विरता से युद्ध करते हुए अपने 12 साथीयो सहीत विरगती को प्राप्त हुए। उनका सर कटने के बाद भी धड लडता रहा और 300 कदम दुर जाकर गीरा!!

>नरुजी के सात पुत्रो मे से चार र्निवंश रहे। शेष तीन मे से ठाकुर बीहारीदासजी को बांसवाडा रावल कुशलसिंहजी ने लाखपसाव सहीत करणपुर नामक ग्राम जागीर मे देकर बांसवाडा दरबार मे स्थापीत कीया।

>नरुजी के ज्येष्ठ पुत्र ठाकुर उदयभाणसिंह उदयपुर छोड राजा भीमसिंह के साथ बनेडा चले गए भीमसिंह जी ने उनको दरबारी कुरब कायदे देकर गीहड्या नामक ग्राम जागीर मे दीया।उदयभाणसिंह जी मेडता से हुए युद्ध मे रणखेत रहे।

>ठाकुर उदयभाणसिंह जी के दो पुत्र चंद्रभाणसिंह(गीहड्या के पाटवी जागीरदार) और कीशोरसिंह ये दोनो भाई महाराजा सूर्यमल्लजी की सेना के महानायक थे अटलनदी पर हुए युद्ध मे दोनो विर चारणो ने तलवारो से कई दुश्मनो के सर धड से अलग कीये और रणखेत रहे।

>किशोरसिंह जी के पुत्र देवाजी को शाहपुरा के महाराजा उम्मेदसिंह ने सह सन्मान आमंत्रीत कर अपने दशोंदी बनाकर दरबार मे स्थान दीया। जोधपुर महाराजा बखतसिंह से पराजीत होकर जयपुर सवाई जयसिंह के पलायन कर जाने पक शाहपुर राजा उमेदसिंह द्वारा बखतसिंह पर कीये गए वीजयप्रद आक्रमण मे विरता प्रर्दशीत करते हुए ठाकुर देवाजी सौदा भी घायल हुए थे ,उनके सिने पर तलवार और तिरो के घाव लगे थे। पूर्ण स्वास्थ्य होने पर राजा उमेदसिंह ने उन्हे पालखी की सवारी व चंवर का सन्मान और सांमतो के बराबर उमराव पद से नवाज कर सोने के जवेरात के साथ बीसनीया ग्राम जागीर मे दीया। यह ग्राम देवाजी के भाई ठाकुर सम्मानसिंह से खाल्सा कर देवाजी को दीया गया था परंतु देवाजी ने वह ग्राम सम्मानसिंह को दीलाकर अपने भ्राता धर्म का पालन करते हुए खुद बीना जागीर के रहे।

देवा जी के पुत्र किरतसिंह जी उनके ओनाडसिंहजी, उनके ठाकुर कृष्णसिंहजी (जो बहोत बडे विध्वान और रजवाडो मे सम्मानीय थे जीनके बारे मे करीब सभी लोगो को पता ही है ईनकी एक पोस्ट क्रमशःभेजी जाएगी) उनके तीन पुत्र ठाकुर केशरीसिंह जी(ईन महापुरुष व क्रांतिकारी के बारे मे कौन नही जानता!!एक पोस्ट है ईनके विषय मे जो मे क्रमश भेजुंगा), ठाकुर जोरावरसिंहजी(क्रांतीकारी विर पुरुष ईनके बारे मे भी एक पोस्ट क्रमशः भेजी जाएगी) ,ठाकुर कीशोरसिंहजी (दरबारी विध्वान कवि थे),ठाकुर केशरीसिंह जी के पुत्र कुँ. प्रतापसिंह जी (विरशहीद नौजवान अंग्रेजो से लोहा लेने वाले!! ईनकी भी एक पोस्ट बनाई है जो क्रमशः भेजी जाएगी)

संदर्भ:-
1)ठाकुर जोरावरसिंह बारहठ स्मृती
- राजलक्ष्मी जी साधना
2)चारण दीगदर्शन
-श्री शंकरसिंह जी आशीया
3)चारण कुलप्रकाश
-ठाकुर कृष्णसिंह जी बारहठ


 जयपालसिंह(जीगर बऩ्ना) थेरासणा

नोंध:- ईस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेर करे परंतु मेरे नाम के साथ छेडछाड ना करे।

ठाकुर साहब जगतसिंहजी करावाडा

करावाडा जागीर के प्रतापी शासक चारणकुल भुषण ठाकुर साहब जगतसिंहजी सौदा बारहठ


   एक बार उदयपुर महाराणा मेवाङ के समारोह में सभी राजपुत तथा चारण सिरदारों को आमंत्रित किया गया।उस वक्त एक दरबारी द्वारा चारण सिरदारों पर टिप्पणी कि गई। उसके प्रति उतर में चारण गुलाबसिंह  ने भरे दरबार मे यह दोहा कहा :-

आँख मुरारी आशिया,श्यामल है भुजदन्ङ।
सौदो जगतो शिश है,गुलबो गुल्ल री गंध।।


 ठाकुर साहब जगतसिंह जी सौदा ये ङुगरपुर महारावल उदयसिंहजी के प्रतिष्ठीत दरबारीयों की श्रैणी मे सर्वप्रथम बैठे जाने वाले उमराव सिरदार थे। महारावल उदयसिंह ने इन्हैं ताजिम ओर बैठक, सोना नवशी जागीर,दोवडी ताजिम सन्मान, हाथी घोडा ,पालकी तथा चंवर का सन्मान और ग्यारह गाँव का पट्टा शासन जागीर के स्वरुप मे प्रदान कर अन्य दरबारी कुरब कायदे प्रदान कीए। वे एक प्रखर राजनीतीग्य थे और डुंगरपुर महारावल के अंगत सलाहकार के पद से विभुषीत थे। महारावल कोई भी कार्य ईनकी सलाह लेकर करते थे। ईससे अतीरीक्त वे एक कुशल योद्घा भी थे।

मेवाङ के प्रधानमंत्री  महामहोपाध्याय कविराजा चारण श्यामलदासजी दधवाङिया द्वारा लिखित महान ग्रंथ वीरविनोद मे ईनका उल्लेख है वागङ रियासत के चारण सिरदारों के ठिकानो मे से पहले दरजे के जागीरदार थे।

 वि.स.1713 कार्तिक 5 को रावल खुमाणसिंहजी ने हाथीजी सौदा को हरोली नामक गाँव ताम्रपत्र सहीत देने का उल्लेख कई वर्षो पहले दर्ज है।

ठाकुर साहब जगतसिंह जी* के पुर्व कि पीढी हरोली (सारेली) गाँव मे रहा करती थी।एंव उनकेपूर्वज
 ठा.जोरावरसिंह सौदा ईसी गाँव के जागीरदार थे ,जिनको ठाकुर जोरजी नाम से जाना जाता था। वे युद्ध मे पराक्रमता से लडते लडते विरगती को प्राप्त होने के कारण उनकी धर्मपत्नी जीते जी सती हुऐ। जिनका स्थान(स्मारक) आज भी हरोली(सारेली) ग्राम मे है। जहा आदिवासी लोग आज भी पुजा अर्चना करते है। ठाकुर जोरावरसिंह सौदा को, झुझार जी बावजी के नाम से आज भी पुजा जाता है। ईनका भी स्थानक है।दोनो स्थान से कुछ दुरी पर कुलदैवी खोङीयार का मंदिर भी स्थित है।

ठा.जोरावरसिंह सौदा के पश्चात कुशालसिंह सौदा को करावाङा गाँव वि.स.1791चैत्र शुदी 4 को शासन जागीर स्वरुप प्रदान कीया गया। कुशालसिंह के पुत्र एवं जगत सिंह के पिता ठाकुर पदमसिंह जी सौदा अत्यधिक तेज व लङाकु प्रवृती के योद्घा होने के कारण दरबार मे ईन्हे आदिवासियों की टुकङी सौपीं गई थी। जो पदम पल्लटन के नाम से विख्यात हुई थी। मालवा से वागङ आये आक्रमणकारियों को सुरक्षा हेतु ङुँगरपुर रावल ने महारावल जग्मालसिहं को बाँसवाङा सुरक्षा हेतु भेजा उनके साथ कुशालसिंह जी सौदा के छोटे भाई समरथसिंहजी सौदा को भी साथ ले गये और विरता पूर्वक युद्ध कीया था तत्पश्चात समरथसिंह जी को उनकी विरता की एवज मे डुंगरपुर रीयासत से तली नामक ग्राम जागीर मे मीला जीनके वंशज वर्तमान मे तली ग्राम मे स्थित है।

ठाकुर जगत सिंह जी ने करावाडा जागीर मे एक रजवाडी हवेली का निर्माण करवाया था, जो आज भी करावाडा में विधमान है।उदय विलास पेलेस की स्थापना करावाडा की हवेली बनने के पश्चात की गई थी। महारावल साहब द्वारा हवेली की निर्माण जानकारी लेने हेतु दरबार से बैडसा ठाकुर साहब को जायजा लेने के लिए भेजा और जिन्होने दरबार मे दोहे द्वारा उक्त व्यक्तव्य कहा :-

दाँता तल उंगली दबे,वाणी बने अबोल,
नयनं ना थाके निरखता,वा जगता वाली पौल।

जय माताजी
जय माँ करणी

संदर्भ ग्रंथ:-

>चारण दीगदर्शन
>रावजी की बही
>विरविनोद

- जयपालसिंह (जीगर बऩ्ना) थेरासणा
- कुँ.रवि बऩ्ना सा करावाडा

सोमवार, 13 अगस्त 2018

देविसिंह रत्नु (स्वामी कृष्णानंद सरस्वती)

*यदि किसी एक ही इंसान में महात्मा गांधी व विवेकानंद जी को देखना है तो वह है दसोड़ी के स्वामी कृष्णानन्द सरस्वती*

राजस्थान की धरती सदैव ही विर प्रसूता रही है । यहां किसी भी व्यक्ति के जन्म की सार्थकता सिद्ध करने की कसौटी है ।

*माई एड़ा पूत जण के दाता के सुर*

*नितर रेजे बांजड़ी , मती गवाज़े नूर*

इसी  कसौटी पर सो प्रतिशत खरे उतरने वाले महापुरुषो में में एक महान आत्मा 1900 ई. में दासोड़ी ग्राम में श्री दौलतसिंह जी रतनु के घर श्री मति उमा बाई की कोख से देवीसिंह नाम के रुप में जन्म हुआ  

शुरु से ही देवीसिंह जी रतनु को समाज सेवा एवम संगठन निर्माण में ने बड़ी रुचि थी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी (काशी )से अध्ययन पूर्ण कर आप समाज को जगाने में लग गए
आपका सम्पर्क राजस्थान की तत्कालीन सभी रियासतो से था । आपकी बेबाकी से अन्याय के विरुद्ध बोलना व लिखना तथा राजा महाराजाओ को तथा जन सामान्य को कुरीतियो के विरुद्ध जगाना का कार्य सतत चलता रहा
उस समय स्वतन्त्रा संग्राम चरम ओर था तब आपका सम्पर्क ठाकुर केशरी सिंह जी बारहठ , खरवा ठाकुर गोपाल सिंह जी , प्रताप सिंह जी , रास बिहारी बोस , आदि से हुआ तथा सेठ जी से आपका प्रगाढ़ परिचय रहा । आप जोशी मठ से सन्यास ग्रहण कर स्वामी कृष्णा नन्द जी सरस्वती बन गए ऋषिकेश में कोढियों की सेवा करने लगे । उसी दरमियान आपकी मुलाकात वर्धा आश्रम में महात्मा गांधी से हुई तो गांधी जी इनकी सेवा से बड़े प्रभावित हुए ।
गांधी जी ने इन्हें राष्ट्र भाषा प्रचार का कार्य सोपा
इस कार्य हेतू आपने पूरे भारत का भर्मण किया तत्पश्यात आप *नेपाल पहुचे थे वहां पर अपने संस्था गत रूप से सेवा कार्य सूरु किया । वहां आपको आँख देने वाला बाबा के नाम से पुकारा जाने लगा । वहां से अफ़्रिका देशो केनिया , जांबिया , धाना , नाइजेरिया , ट्रांसवाल, आदि स्थानों पर आपने दिनबन्धु समाज ' *हयूमन सर्विस ट्रस्ट* ' *की स्थापना की*।

*पूर्व राष्ट्रपति श्री वी . वी . गिरी ने कहा "स्वामी कृष्णा नंद जी सरस्वती ' भारतीय संस्कृति के दूत है*

आप विश्व भर्मण के क्रम में लंदन गए वहां  हेरो में स्वामी कृष्णा नंद आश्रम की स्थापना की वहा पर ' *मिल्स ऑन विल्स* ' कार्यक्रम से भूखो को भोजन दिलाया

वहां से आप अमेरिका गए वहां के *राष्ट्रपती केनेडी व रुजवेल्ट आप से बहुत प्रभावित हुए वहां ह्यूमन सर्विस ट्रस्ट की स्थापना की। वह के अखबार में आलेख छपा पेनीलेस बट बेरी रिच सेंट ' आपने  वहां सयुक्त राष्ट्र सभा को भी सम्बोधित किया* ।

1967 ई. में आप मोरिशस पधारे , यहां पर तक फ्रांसीसी  सरकार के जुल्म से आहत  भारतीय मूल के लोग बड़े दुखे थे , स्वामी जी का अवतरण ही दुख निवारण के लिए हुआ था *आपने मोरीरिश पहुच कर धोषणा  करके कहा कि में यहां। शिष्य बनाने नही नेता तैयार करने आया हु*।

*शिव सागर राम गुलाम ने स्वामी जी का शिष्यत्व स्वीकार किया व इनके नेतृत्त्व में मोरीरिश में स्वामी जी ने एक लाख रामायण , एक लाख गीता , छह लाख हनुमान चालीसा  मोरीरिश के घर घर पहुचा कर पूरे देश मे अलख जगा दी । जगा हुआ देश भला कब तक गुलाम रहेगा आपके नेतृत्व में देश। आजाद हुआ* ।

*स्वामी जी को राष्ट्र पिता का दर्जा दिया गया*

 । आर्युवेद को राजकीय मान्यता मिली । आपने अफगानिस्तान में स्वामी कृष्णा नंद पाठशालाओं की स्थापना की । स्वामी धर्म प्रचार हेतु अरब देशों  में भी गए थे जहां भगवा वस्त्र धारण कर कोई जा नही सकता था ।
तो स्वामी जी ने सफेद वस्त्र पहन कर कोई जा नही सकता तो  स्वामी जी ने स्वेत वस्त्र धारण किये तथा वहां सेवा केंद्रों की स्थापना की आज लगभग 60 से 65 देशो में इनके सेवा केंद चल रहे है ।

सन्दर्भ- चारण दर्पण

सुल्तान सिंह देवल
चारणाचार पत्रिका, उदयपुर

विर योद्धा नरुजी कविया

*!!सुप्रसिध्द यौध्दा नरुजी कविया !!*


*नरूजी कविया सुप्रसिध्द भक्त-वर कवि सिध्द अलूनाथ जी कविया के बङे सुपुत्र थे, नरुजी एक उत्कृष्ट कोटि के यौध्दा थे,बादशाह अकबर ने सन 1587 में मुगल साम्राज्य के सुदुर पूर्व के प्रान्तों में बंगाल, बिहार, उङीसा के अफगानों एंव स्थानीय शासकों के निरन्तर होने वाले उपद्रवों का दमन करनेहेतु आमेरके कछवाहा शासक मानसिंह को सर्वोच्च सेनापति और उच्च सुबेदार के पद पर नियुक्त किया था, मान सिंह ने अपने रण कौशल तथा सूझ-बूझ से अपने कर्तव्य को पूर्णकिया !!*

*नरू जी कविया मानसिंह की कछवाही सेनाके एक प्रतिष्ठित यौध्दा के रूपमें इस सेना के अभियान में साथ में थे, अफगान कतलू खां लोहानी ने उङीसा का शासन हस्तगत कर उसने पुरी के राजा को हरा कर प्रसिध्द जगन्नाथ मंदिर पर भी कब्जा कर लिया था ! उसने वहां पुजारियों तथा तीर्थ यात्रीयों पर तरह-तरह के अत्याचार करने प्रारम्भ कर दिए ! अतः मानसिंह ने अपने कुंवर जगतसिंह के नेतृत्व में एक बङी सेना कतलूखां के विरूध्द भेजी थी, यह घटना अप्रेल1590 की है ! उस सेना में जिन विश्वासपात्र सेनानायकों को कुंवर के साथ भेजा गया, उनमें नरूजी कविया प्रमुख थे !!*

*अफगानों ने शाही सेना पर भीषण अति भीषण आक्रमण कर दिया 21मई1590 को सूर्यास्त के समय के प्रहार को झेलने में मुगल सेना भी असमर्थ रही और उसी उसके पांव उखङ गए ! परन्तु कुछ वीरों ने बङी वीरता के साथ शत्रुऔं का सामना करते हुए,अपने प्राणों का बलिदान किया जिनमें चारण नरूजी कविया एंवं राठौङ महेश दास जी बीका प्रमुख थे ! इन दोनो महावीरों ने अपने प्राणों की आहूति देकर जगतसिंह की रक्षा की ! नरू जी कविया ने असाधारण वीरता दिखाते हुए सम्मुख युध्द में अपने भाले द्वारा कतलू खां को मारते हुए स्वंय भी वीर गति को प्राप्त हो गए ! नरूजी की इस अलौकिक अदभूत वीरता पूर्वक प्राणौ उत्सर्ग की प्रशस्ति में महाराजा श्रीपृथ्वीराज जी राठौङ का यह डिंगऴ गीत प्रसिध्द है !!*              

*!! गीत !!*

*जां लागै दुखे नहीं सजावौ,*
*बीजां तजिया जूंझ बंग !*
*मोसै नरु तणै दिन मरणे,*
*अण लागां दूखियो अंग !!*

*पांव छांडता चढतां पैङी,*
*ईख्यो अलू सुतण निज अंत !*
*अण लागां दुखेवा आंणै,*
*दीठा नह फूटा गज दंत !!*

*अनराईयां हेमकर ओपम,*
*रहियो रूतो महारण !*
*कूंता हूंत मेहणी कवियै,*
*तद तीखा जाणांय तण !!*

*कतलू सरस बदंता कंदक,*
*टऴ्यो नहीं सुरातन टेक !*
*साहे खाग नरु पहुंतो श्रग,*
*ओजस बोल न सहियो ऐक !!*


*यह वीर गीत उस समय के प्रसिध्द कवि व यौध्दा पृथ्वीराज जी राठौङ जो कि उस समय में मौजूद थे व उस समय की सारी घटनाऔं के उपर गहरी सूझबूझ रखते थे उनके बनाने से इस गीतकी विश्वसनियता अधिक प्रामाणिक होती है, पृथ्वीराज जी ने महाराणा प्रतापसिंह जी पर भी बहुत काव्य लिखा था !!*

राजेंन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर !!

ठाकुर दयालदासजी सिंहढायच

!! ठाकुर दयालदास जी सिंहढायच !!

दयालदासजी चारण जाति री सिंहढायच शाखा में जन्मिया अनमोल रतन हा, अर इतिहास व साहित री महत्ती सेवा कीधी, राजस्थान रा उगणींसवी सदी रा अनेक नामी ख्यातकारां में दयालदासजी रो नाम हरावऴ पांत में आवै है, दयालदास जी ऐक इतिहास री ख्यात लेखक ही नहीं हा वे ऐक सुकवि अर सटीक टीकाकार भी हा !

उणां आपरे लेखन रे सागै बीकानेर राज्य री बहियां, वंशावऴियां, पट्टा परवाना एंव शाही फरमाना ने भी जुगत सूं जचाय अर घणी सूझबूझ अर लगन सूं करियो !!

दयालदास जी तीन ख्यातां है !
(1) राठौङां री ख्यात सन 1852 ई. !
(2) ख्यात देशदर्पण सन 1870 ई. !
(3) आर्याख्यान कल्पद्रुम 1877 ई. !

ख्यातां सगऴी गद्य रूप में रचियोङी है पंवार वंश दर्पण पद्य रूप में पिरोयेङी है
इण सारी लाखीणी लेखणी री रचनावां टाऴ भी सिंहढायच रो सांगोपांग सृजन कम सूं कम बीसेक फुटकर गीतां रे रूप में मिऴै है !!

जोधपुर राज्य मे सिंहढायचो री जागीर मोघङा सूं आयर बीकानेर राज्य रा कुबिया ठिकाने मे आबाद हुया सिंहढायच चारणां रे घरै ठाकुर खेतसिंह जी रे पुत्र रूप में विक्रमी सम्वत 1855 में दयालदास जी रो जन्म हुयो, ठाकुर खेतसिंह उण समै प्रतिष्ठित जागीरदार चारण घराणैं री गिणती में आवता हा !!

डिंगऴ अर राजस्थानी साहित रा मर्मज्ञ दयालदासजी बीकानेर रियासत रा तीन शासकां महाराजा रतनसिंह, महाराजा सरदारसिंह, महाराजा डूंगरसिंह आं तीनां रा राजकाज में साथै रैया अर योद्घा, राजकवि, ख्यातकार, दरबारी मंत्री इतिहासकार अर कुशल कूटनितिज्ञ रे रूप में आपरी महता रौ निरूपण करियो ! इणमें ऐक बात घणी ईधकी है कि आपरै ख्यात लेखण में कहाणी किस्सां री बजाय बीकानेर राज रा आरम्भ सूं आखिर बरसां तांई रो जीवन्त अर जागृत लेखन लिखियो, जिको मूंढै बोलतो सरस अर रूचिकर इतियास है !

दयालदासजी सिंहढायच पर सुरसती देवी री अनहद कृपा ही, उणरो सुरसती सिमरण रो ऐक दोहो जिणमें मातेश्वरी नें अरदास कर सुरसत रे साथे धनदा देवी लिछमी री कृपा भी सुरसती सूं अनुषंशा करने करवाय लीवी !!

वीणां धारद कर विमल,
भव तारद सुर भाय !
हंसारूढ दारद हरो,
शारद करो सहाय !!


राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर !!

बुधवार, 8 अगस्त 2018

मेवाड प्रधानमंत्री महामहोपाध्याय श्यामलदासजी दधवाडीया(चारण)

*कविराजा श्यामलदास जी दधिवाडिया द्वारा शिक्षा हेतु सद्प्रयास  और मेवाड़ चारण समाज के गौरवशाली प्रसंग*
✒🌸🌸🌸🌸🌸🌸

 विलक्षण देविपुत्र चारण समाज में प्रतिभा तो मातेश्वरी की अटुट कृपा से  जन्मजात होती है मगर शिक्षा का व्यापक  ज्ञान व्यवस्थित रूप से जिनको मिला उन्होंने दुनिया में नाम दर्ज करवाया।
राजस्थान में शिक्षा का सामुहिक प्रयास सर्वप्रथम उदयपुर में कविराजा शामलदास जी के प्रयासों से सम्वत 1937 में हुआ। कविराजा शामलदास के गुणों से महाराणा सज्जनसिंह जी इतने प्रभावित थे कि वे राजपूत जाति व राजपूत राज्यों के लिए समस्त चारण जाति को ईश्वरीय देन समझने लगे। उनके मन में यह दृढ़ हो गया की राजपूत जाति को पतन से रोकना है तो पहले चारणों को सुशिक्षित करना चाहिए। इनसे बढ़कर निर्भिक सलाहकार,पूर्ण विश्वस्त और शुभचिंतक अन्य कोई नहीं हो सकता।इस बात को वे जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह जी और महाराजा कृष्णगढ़ शार्दुल सिंह जी को अनेक बार कहा करते थे।इसी विश्वास व संस्कार के कारण व  कविराजा की प्रार्थना पर महाराणा सज्जनसिंह जी ने क्षत्रियों की वार्षिक आमदनी का दशमांश हिस्सा जिला हाकिमों की मारॅफत मंगवा कर चारण पाठशाला के नाम से मदरसा बनवा कर उसमें चारणों के लड़कों की पढ़ाई में खर्च करने का निश्चय किया। तदनुसार सम्वत 1937 (सन 1880)में पाठशाला और छात्रालय कायम हुआ उसमें छः मास्टर नियत किए गए,साथ में नौकरों ,पठन पाठन की सामग्री, छात्रों का भोजन वस्त्र समस्त खर्च राज्यकोष से दिया जाने लगा, जब तक पाठशाला एवं छात्रावास का स्वतंत्र भवन नहीं बन तब तक उमराव सरदारों की हवेलीयों में काम चलाया जाता। सबसे पहले *सौदा बारहठों के गांव राबछा* में पहाड़ जी की हवेली में इसका श्री गणेश हुआ , जिसमें क्रांतिकारी केसरी सिंह जी बारहठ ने भी शिक्षा प्राप्त की थी।
प्रत्येक सोमवार को जहां महाराणा की इच्छा होती वहां चारण छात्रों सहित, बड़े बड़े साहित्यकारों विद्वानों के साथ सभा होती जिसमें साहित्य रसज्ञ ठाकुर मनोहर सिंह जी डोडिया (सरदारगढ़), स्वामी गणेशपुरी जी,डिंगल कब प्रतिनिधि महियारिया मोड़ सिंह जी विद्वर उज्जवल फतहकरण जी , शहर के अन्य कवियों के साथ महाराणा स्वयं सभाध्यक्ष पद पर आसीन रहते । यह व्यवस्था चार साल तक चली उस समय एक सौ से अधिक चारण छात्र एकत्रित हो चुके थे क्योंकि बालकों को लाने आ काम स्वयं कविराजा शामलदास जी करते थे।
 *ये दिन चारण जाति के लिए अहो भाग्य के थे।*
 परन्तु ईश्वर की सृष्टि में उलूक स्वभाव आदमी भी उत्पन्न होते ही है। इतनी सुविधाएं होने पर भी पाषाणजीवन अनेक चारण अपने बालकों को नहीं भेजते थे।विवश होकर कविराजा जिला हाकिमों द्वारा पुलिस व जागीरी सवार भेजकर लड़कों को पकड़वा मंगाते । उस समय का द्रश्य दु:ख और करूणा से भरा हुआ था। दुःख था चारणों के मुर्खतापूर्ण मोह पर व करूणा थी बालकों के रूदन को शतगुणित करने वाले घर के भीतर माता,भुआ,बहिन, पिता भाई दादा आदि के बूढ़ क्रंदन पर । बालक का एक  हाथ होता सवार के हाथ में व दुसरा हाथ होता पिता व अन्य परिजनों के हाथ में। इस प्रकरण में सहस्त्रों गालियां पड़ती कविराजा जी को, उनके घर वंश पर आग रखी जाती और रोम रोम में किड़े पटके जाते। कल्पना की जा सकती है कि किन विपरीत परिस्थितियों में चारण समाज में शिक्षा हेतु कविराजा ने अथक प्रयास किए।
======================

महेंद्र सिंह चारण

रविवार, 29 जुलाई 2018

THIKANA - THERASANA JAGIR👑

THERASANA (JAGIR)


DYNASTY - CHARAN
CLAN - SINHDHAYACH
SUB CLAN - GOPALSINGHOT
VILLAGES - 4
STATE -  IDAR,GUJARAT
TITLE - THAKUR
REVENUE - INR 30,000
AREA - 93.74 km2
HINDI NAME - थेरासणा
FOUNDED BY - THAKUR GOPALSINGH JI
GRANTED BY - RATHOD RAO KALYANMALJI OF IDAR PRINCELY STATE

*>Thakur Gopalsingh ji Sinhdhaych*

 He was the first ruler (Thakur) of "Therasana" Jagir which included 4 villages.

  King of idar Once after demise of heaven Mahatma Sanyaji was in greif and sorrow because Sanyaji was a special gem of state court ministers and king of idar.
King Kalyanmal needed  a good soldier and literate "Charan" in the  place of Sanyaji for governing the idar state. King of Mewar got to know the whole thing on the visit of idar king to court of mewar .
On realising the pain and sorrow of the king he decided that Special court Gopalsingh Sinhdhaych he was back then a warrior and a great literate would be sent to idar by agreeing on specific terms.
King kalyanmal decided to give the  highest income's Jagir in state of 4 villages ,double tazim's nobel , 2 elephants, 12 horses were anchored in leg and accustomed to thakur gopal singh.

Many Thakur's and Jagirdar's of Therasna in court of idar Dynasty has served in the form of their ministers and counsellors for many years.

*-kr.jaipal singh Therasna*

reference-
- *furbus rasmala*
- *rao ji's bahi*

चारण हुँ मे

*चारण हूँ मैं*

*ले.पद्मश्री ठाकुर सूर्यदेवसिंह जी पालावत*

इतिहासों ने पढ़ा,
रसों ने जिसको गाया
तलवारों की छौहों ने,
जिसको दुलराया,
वही कलम का धनी,
ज्ञान का कारण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||

शिव से लेकर शक्ति,
शक्ति का विश्वासी हूँ|
महाशक्ति में विश्वासों की
मैं गंगा हूँ, मैं काशी हूँ|
पूजित हिंगलाज व चावंड
स्थापित करणी माता आवड़
विदित गिरवरा, बैचर बरवड़,
खोडियार कामख्या तेमड़
इन्दर, सायर, सोनल, देवल
सैणी राजू बट्ट अर बल्लर|
महम्माय का कृत कृतज्ञ हूँ|
चरण धूल हूँ पुण्यनमन हूँ,
बांकीदास, उम्मेद, मुरारि,
सावल, दुरसा, जाड़ा, लखा|
लंघी काना सायां झूला
पिंगल हरदा कागा दूल्हा|
सूर्यमल बारू वीरों सा,
रचना, साहस और शौर्य की
त्रिवेणी का झरना हूँ मैं|
प्राप्त अधिकृत अधिकारों के
विरोध का धरना हूँ मैं|
जोरावर प्रताप केसरी,
तिल तिल विगलित तदापि प्रञ्चलित
अमर क्रान्ति का कर्ता हूँ मैं|
मारवाड़ की बुद्धि शिरा विञ्जी लालस सी
उज्ज्वल व ब्रदी गाडण सी|
फैली ज्ञान प्रखरता हूँ मैं|
मैं श्रद्धा का तीर्थ, आस्था का हूँ मंदिर,
रहा राज्य चाणक्य, सभा श्रृंगार,
सनातन धारण हूँ मैं|
भाषा पंडित प्रवण स्नेह का श्रावण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||
चारण हुूँ मैं।

अति अतीत के स्मरित विस्मरित,
घटनाओं का एकल लेखक|
रण प्रांगण के घोर युद्ध का,
गर्जक तर्जक अंकक मापक|
समय समय से लिखी जा रही,
विविध विधा का रूपक चित्रक|
ईसरदास प्रभृति सन्तों की,
भक्तमाल का मोती मानक|
पखाडों की महिमाओं का,
जगदम्बा का गाथा गायक|
उतर भारत चर्चित चिन्हित,
करणी माँ का अर्चक वन्दक|
चारू चरित उतम अन्तर्मन,
आदर्शों का शाश्वत सरजक|
काल-भाल पर अमिट उभरता,
अक्षर, सुन्दर, सत्य सार्थक|
अवतारों की पीढ़ी हूँ मैं,
सदाचार की सीढी हूँ मैं,
भावी का मैं पूर्व निमन्त्रण,
वर्तमान आमन्त्रण हूँ मैं||
चारण हूँ मैं||

चारणो मे सिंहढायच वंश की जागीरे

🚩 *सिंहढायच वंश की जागीरे*🦅

*🚩मोगडा🦅:- चारण नरसिंह जी  भांचलीया को मंडोर के शासक पडीहार नाहडराव ने सवंत 1116 मे हाथी घोडा व सोना जवेरात भेंट कर सोनानवेस आलीशान  "मोघडा" जागीर प्रदान की । राज्य के दसोंदी पद से सुसोभीत कर दरबार मे सन्मान भरा स्थान दीया।ईनके वंशज सिंहढायच कहेलाते है। यह जागीर ग्राम सिंहढायचो का मुळ स्थान है।*

रैवाडा:- चारण चैनसिंह बीजावत सिंहढायच को कुंपा जोगावत सिवाणा ने 1710 से पूर्व रैवाडा जागीर प्रदान की।

उजला:- ठा.लालसिंह नोखावत सिंहढायच को रावल गौवींद नरावत ने उजला जागीर प्रदान की।

पूनावा:-ठा.पूनाजी सिंहढायच को सीरोही राव अखैराज ने पूनावा जागीर प्रदान की।

कानावास:-सिंहढायच रतनसिंह को राव कानजी शिवराजोत ने कानावास जागीर मे दीया।

नेठवा:- मनीषी समर्थदानजी सिंहढायच को कश्मीर दरबार मेे से  कई कुरब कायदे प्रदान कीए।

ओसारा:- सिंहढायच गोंवीदसिंह को बांसवाडा रावल पृथ्वीसिंहजी ने 1825 मे ओसारा जागीर प्रदान की।

थेरासणा:-ठाकुर गोपालसिंह सिंहढायच को ईडर राजा राव कल्याणमलजी ने 1648 मे  30,000 आय के आलीशान चार गाँव का पट्टा जागीरी एनायत कीया।दरबार के सभी कुरब कायदे प्रदान कीए।

भारोडी:-
1865 के आसपास ठाकुर खुमानसिंह सिंहढायच को महाराणा शंभुसिंह जी ने भारोडी जागीर प्रदान की ।

*जयपालसिंह (जीगर बन्ना)थेरासणा*

और सिंहढायचो के जागीर गाँवो के ईतीहास की जानकारी कोई जानते हो तो कृपया 7984994645 पर मुजे मेसेज करे🙏🏾

महाराणा सांगा और शूरविर चारण ठा. जामण जी सौदा

*सेणुंदा ठिकाने के शूरविर चारण ठाकुर जामण जी सौदा*


  *मेवाड़ के भीलवाड़ा जिले में  ठाकुर जामण जी सौदा सेनुदा गाँव के जागीरदार थे । ये अपनी विद्वता व वीरता के लिए प्रसिद्ध थे* । *आपके पिता जी पालम जी व दादा जी का नाम ठाकुर बाजुड़ जी था* ,

*बाबर व राणा सांगा के बीच हुए 1527 ई के युद्ध मे ये राणा सांगा के साथ स्वयं युद्ध मे सेनापति के पद से लड़े थे* ।
*राणा सांगा के मस्तक में तीर लगने से ये जब गायल होकर मूर्छित हो गए थे । तब इन्हें युद्ध क्षेत्र से हटाकर बसवा लाया गया था । मुर्छा खुलने पर वीर राणा सांगा को युद्ध से हटाए जाने का बहुत ही दुख हुआ तब ठा. जामण सौदा ने राणा सांगा को सांत्वना दी कि युद्ध से लौटने के कारण कोई योद्धा अपयश का भागी नही होता है । भगवान कृष्ण स्वयं जरासध से युद्ध मे सात बार भागे थे किंतु आठवी बार विजयी होकर जरासंध का वध कर दिया । आज हम लोग मूर्छित अवस्था मे आपको युद्ध भूमि से उठा लाए है पर कल जब आप पुनः स्वस्थ होकर बाबर पर विजय प्राप्त करेंगे तब आपका युद्ध भूमि से लौट आना ही मेवाड़ के गौरव का कारण बनेगा* ।

*बाबर से  युद्ध में पराजित होने के कारण राणा सांगा बहुत ही निराश हो गया था तथा अत्यंत उदास रहता था वह न तो कभी महल से बाहर आता था व न ही किसी से मिलता जुलता था*

*तब जामण सौदा ने एक गीत की रचना कर राणा सांगा को सुनाया । उस गीत को सुन कर राणा सांगा इतने प्रभावित हुए की उन्होंने बकान नाम गाँव जामण सौदा को भेंट किया था । जामण सौदा एक युद्ध नायक थे तथा सन 1584 ई में माडु के बादशाह से लड़ते हुए पीली खाल में वीर गति को प्राप्त हुए थे । जामण सौदा के लिखे हुए कई डिंगल गीत उपलब्ध होते है* ।


*चारणाचार पत्रिका उदयपुर*
*सुल्तान सिंह देवल*

विर चारण खीमजी दधवाडीया और मेवाड



*धन राणा इकलिंग* ,
*धन मेवाडा देश* ।

*धन जैमल दधवाडिया*
*जीण घर खीम नरेश*


*धारता गाँव केउदयभाण जी के  पुत्र  खीम जी के नाम पर पढ़ा खेमपुर ठिकाने का नाम*

*मेड़ता परगने के दधवाड़ा गाँव से चितोड आये जेतसी को मिले धारता गाँव के उदैभान जी के पुत्र खीम जी अपनी किस्मत आजमाने मेवाड़ के ही सारंगदेवोत के ठिकाने बाठेड़ा के राव भोपत जी के पास आये*

*राव भोपत जी बाठेड़ा के जागीरदार थे व बहुत ही समझदार व गुणग्रही थे । उनकी समझदारी के चर्चे दूर दूर तक फैले हुए थे*
*खीम जी धारता से सुबह अपना धोड़ा लेकर बाठेड़ा के लिए निकले चलते चलते दोपहर हो गई थी सूरज सिर पर था तो खीम जी ने सोचा कि थोड़ा आराम कर लूं यह सोच कर वह एक घने पेड़ के नीचे साथ लाये चूरमा खा कर कुछ देर आराम करने लग गये ।  थोड़ी देर बाद उनके चेहरे पर धूप आने लगी तो वहां एक सर्प अपने फन से उनके मुंह पर छाव कर रखी थी तभी वहां से गुजर रहे सेठ ने यह नजारा देखा तो वह रुक गया व खीम जी के जगने का इंतजार करने लगा थोड़ी देर बाद खीम जी की नींद खुली तो साँप अपने बिल में चला गया तो सेठ जी ने खीम जी से आज के उनके सुकून सेठ को देने को कहा तो खीम जी बचपन से बड़े हुसियार थे मन ही मन उन्होंने  सोचा कि सेठ जी ने जरूर कुछ अच्छा देखा होगा तो खीम जी ने मना कर दिया सेठ जी के लाख समजाने पर भी खीम जी ने हा नही की तब सेठ ने कहा कि ठीक है एक वचन दे दो की जब आपकी नोकरी लग जाय और आप बहुत बड़े आदमी बन जाओ तो मुझे अपने पास नोकरी पर  रखना खीम जी ने हा कर दी  । और दोनों अपने अपने राश्ते निकल गये*

*सन्ध्या होते होते खीम जी बाठेड़ा पहुच गए वहां रावले में जाते ही राव भूपत जी को मुजरा किया तो चारण के बेटा होने के कारण राव ने भी मर्यादापूर्वक खड़े होकर कर खीम जी का ससम्मान करते हुए अपने पास बिठा कर पूरा परिचय लेते हुए आना का कारण पूछा  । कुछ देर बात करने में बाद  खीम जी का डेरा करवा दिया । खीम जी की वाक चतुराई रोबीले चेहरे तमीज व तहजीब से बहुत प्रभावित हुए । और खीम जी को अपने पास रख लिया । कुछ ही समय मे खीम जी ने कुछ ही समय मे राव जी का विश्वास जीत लिया अब क्या था अब तो राव जी जहां भी जाते खीम जी राव जी के साथ कहि भी ठिकाने में पधारे तो खीम जी साथ, शिकार पर जावे तो खीम जी साथ , उदयपुर महलो में आवे तो खीम जी साथ*,

*एक बार महाराजा करन सिंह जी ने अपनी सेवारत एक नरुका राजपूत को नाराज होकर  मरवा दिया था उस नरुका राजपूत कर छोटे भाई ने उसी दिन साफा फेककर सिर पर अंगोछा बांधकर कसम खाई की जब तक अपने भाई की मौत का बदला ना ले लू तब तक साफा नही बांधूगा । यह बात खीम जी ने राव भूपत जी से खीम जी ने सुन रखी थी*।

*एक दीन खीम जी उदयपुर दरबार के पास जा रहे थे राश्ते  एक शिकलिकर के वहा एक  अंगोछा बांधे गुड्सवार पर नजर पढ़ी जो शिकलिकर को यह कहते हुए सुना कि इस तलवार की धार ऐसी करना कि किसी दुसरे की तलवार पर ना हो मुह मांगा पैसा दूँगा खीम जी बड़े समझदार व आगामी स्तिथि को भाप चुके थे खीम जी ने उसके रोबीले चेहरे आखो में गुस्सा सिर पर अंगोछा देख कर समझ गए कि यह वही नरुका राजपूत है और आज कोई ना कोई अनिष्ट करेगा*

*खीम जी भी दूसरी गली के सिकलिकर को अपनी तलवार की धार के लिए देकर चले गए पर खीम जी को नीद कहा खीम जी सोच रहे थे कि यह नरुका करेगा क्या महाराणा तक तो पहुच नही सख्ता क्यों कि पहरा सख्त है सोचते सोचते खीम जी ने सोचा कि यह जरूर कुँवर जगत सिंह जी को यह कोई नुकसान पहुच सख्ता है क्यों कि कुँवर जगत सिंह जी को शिकार का बहुत सोख था वह हर रोज आपने मित्रो के साथ मछला मंगरा पर शिकार को जाते थे । राणा जी  रोज कुँवर जगत सिंह को अपने महलो के झरोखे से आते व जाते देखते थे*।

*सुबह होते होते खीम जी सीतला माता। मंदिर के वहा पहुच गए थोड़ी ही देर में वह अंगोछा बाँधे नरुका भी आ गया  नरुका ने सोचा यह कोई कुँवर के साथ शिकार पर जाने वाला गुड्सवार होगा  नरुका कुँवर जगत सिंह जी का इंतजार करने लगा खीम जी भी सतर्क थे । थोड़ी ही देर में महलो की तरह से 15 से 20 लोगो के हसने की आवाज व घोड़ो के तापो की आवाज सुनाई दी नरुका ने अपने घोड़ा की लगाम पकड़ अपना हाथ तलवार की मुठ पर रख दिया खीम जी को समझने में देर नही लगी नरुका आगे बढ़ा और अपने घोडे को कुँवर जगत सिंह के पास लगाते हुए जोर से चिल्लाया की सावधान कुँवर में अपने भाई का बदला लेने आया हु यह सब नजारा महलो से राणा जी देख कर घबरा गए कि आज तो कुँवर जी गए मगर अगले ही पल में देखा की खीम जी ने  घोड़े को आगे बढ़ाया ओर तलवार निकाल कर तूफान की तरह अपनी तलवार से नरुका के दो  टुकड़े कर दिए और अपना घोड़ा गुमा कर बेठेड़ा पहुच गए*

वहां जाकर राव भूपत जी को सारी कहानी बता दी राव जी ने खीम जी को गले लगाया व कहा कि शबाब खीम जी शाबास आज तो आपने कमाल कर दिया मेवाड़ केके धणी को बचा लिया तेरे इस कार्य से राणा जी तुज से तो खुश होंगे ही पर आज मेरा रुतबा भी बढ़ गया राव जी खीम जी को साथ लेकर महलो में पहुचे*

*वहां पहुचते ही कुवर जगत सिंह जी खीम की को पहचान लिया कि यही वो गुड्सवार था जिसने नरुका को मार गिराया*
*राणा जी का खुसी का कोई पार  नही था राणा जी ने खीम जी को अपने गले लगा कर कहा मेरे तीन बैठे थे आज से चार हो गए  ओर खीम जी का खर्च भी दूसरे राजकुमार की तरह राज कोष से बांध दिया*

*महाराणा करण सिंह जी के स्वर्गवास होने के बाद जगत सिंह जी सिंहासन पर बैठ कर राज्य संभाला तब खीम जी को सत्तर हजार सालाना की आमदनी वाला गाव ठिकरिया इनायत किया और महाराणा ने इस गाँव का नाम ठिकरिया से खिमपुरा रखा जो खीम जी  के नाम पर था जिसे आज खेमपुर के नाम से जाना जाता है यह उदयपुर जिले करीब 40 km है व  मावली तहसील में आता है । इनके वंसज आज भी खेमपुर व उदयपुर में निवास करते है*

*महाराज राज सिंह जी भी खीम जी को बहुत मॉन सम्मान देते थे एवम काका कह कर पुकारते थे*

*स्वभाव से खीम जी बड़े सकीन , दानी , व जिंदा दिली इन्शान थे*

*खीम जी वीर ओर  दानी के साथ साथ बड़े कवि भी थे उनकी वीरता के कारण मेवाड़ में उनको बड़ी जागीरी प्रदान की गयी*

*महाराणा अखे सिंह जी ने अपने पिता राज सिंह का बदला ले कर सभी दुश्मनो को मरवाया इस उपलक्ष में खीम जी ने एक गीत की रचना की जिससे सिरोही महाराव ने खीम जी को सिरोही जिले के कासिन्द्रा गाव दिया*

*सवत स्तर , सातो बरस , चेत सुदी चवदस* ,
*कायन्द्रा कवि खेम ने , अखमल दियो अवस्स*


*चारणाचार। पत्रिका उदयपुर*
*सुल्तान सिंह देवल*

विर अजीतसिंह जी मीषण ठिकाणा मेरोप

*चारण अजित सिंह जी गेलवा* (मिषण) ( *मेरोप डूंगरपुर* )

ब्रिटिश सरकार ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता के बाद तुरंत हिंदुस्तान में हथियार पर पाबंदी लगा दी और उनके लिए अलग कानून बनाया। इसकी वजह से क्षत्रियों को हथियार छोड़ने पड़े। इस वक्त लूणावाड़ा के राजकवि अजित सिंह गेलवाले ने पंचमहाल के क्षत्रियों को एकत्र करके उनको हथियारबंधी कानून का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। सब लूणावाड़ा की राज कचहरी में खुल्ली तलवारों के साथ पहुँचे। मगर ब्रिटिश केप्टन के साथ निगाहें मिलते ही सबने अपने शस्त्र छोड़ दिए और मस्तक झुका लिए। सिर्फ़ एक अजित सिंह ने अपनी तलवार नहीं छोड़ी। ब्रिटिश केप्टन आग बबूला हो उठा और उसने अजित सिंह को क़ैद करने का आदेश दिया। मगर अजित सिंह को गिरफ़्तार करने का साहस किसी ने किया नहीं और खुल्ली तलवार लेकर अजित सिंह कचहरी से निकल गए; ब्रितानियों ने उसका गाँव गोकुलपुरा ज़ब्त कर लिया और गिरफ़्तारी से बचने के लिए अजित सिंह को गुजरात छोड़ना पड़ा। वह गुजरात छोड़ कर राजस्थान के डूंगरपुर में आ गए यहां के महा रावल इनकी वीरता पर बड़े खुश हुए व इनको डूंगरपुर जिले में मेरोप गाँव एक ताम्र प्रत्र लिख  दिया जिसकी फोटो पोस्ट के साथ मे है ।  क्षत्रियोचित वीरता से प्रभावित कोई कवि ने यथार्थ ही कहा है कि-

*मरूधर जोयो मालवो, आयो नजर अजित;*
*गोकुलपुरियां गेलवा, थारी राजा हुंडी रीत*

*कानदास महेडु एवं अजित सिंह गेलवाने ने साथ मिलकर पंचमहाल के क्षत्रियों और वनवासियों को स्वातंत्र्य संग्राम में जोड़ा था। इनकी इच्छा तो यह थी कि सशस्त्र क्रांति करके ब्रितानियों को परास्त किया जाए। इन्होंने क्षत्रिय और वनवासी समाज को संगठित करके कुछ सैनिकों को राजस्थान से बुलाया था। हरदासपुर के पास उन क्रांतिकारी सैनिकों का एक दस्ता पहुँचा था। उन्होंने रात को लूणावाड़ा के क़िले पर आक्रमण भी किया, मगर अपरिचित माहौल होने से वह सफल न हुई। मगर वनवासी प्रजा को जिस तरह से उन्होंने स्वतंत्रता के लिए मर मिटने लिए प्रेरित किया उस ज्वाला को बुझाने में ब्रितानियों को बड़ी कठिनाई हुई। वर्षो तक यह आग प्रज्जवलित रही।


सन्दर्भ  अम्बा दान जी रोहड़िया
स्वतन्त्रा संग्राम में चरणों का योगदान आलेख जो कि मेवाड़ की परिवार परिचय पुस्तक में आ रहा है

चारणाचार पत्रिका उदयपुर
सुल्तान सिंह देवल 

हल्दीघाटी के सेनानायक विर चारण रामा सांदु

*हल्दी घाटी युद्ध मे चरणों का योगदान के आलेख से रामा सांदू जी का वर्णन*

मध्य काल मे कई चारण विद्धता के साथ ही साथ महान सेना नायक भी थे । उन्ही महान सेना नायको व योद्धाओ में एक प्रमुख नाम धर्मो जी सांदू के पुत्र रामा जी सांदू का आता है इनका जन्म मेवाड़ के चितोड़ जिले के  हुपा खेड़ी  गाँव मे हुआ ।वर्तमान में इस गाँव का नाम हापा खेड़ी के नाम से जाना जाता है ,  रामा जी सांदू महाराणा प्रताप की सेना के सेनानायक के रूप में हल्दी घाटी के युद्ध मे उपस्थित थे । उन्होंने बड़ी वीरता से युद्ध किया  तथा मुगल सेना को सर्वाधिक क्षति पहुचाने वाले दल के सेना नायक थे ।
दयाल दास राव द्वारा लिखित      " राणा रासो " में हल्दी घाटी के युद्ध का विस्तृत वर्णन मिलता है जिसमे एक भुजंगी छंद रामा सांदू के बारे में लिखा गया है ।

*भगी भीर भाऊ आशाउ उकढयौ*
*महा मोर मा झीनी के मुखख चढ़यो*
*जीते जुधध जोधा जुरे स्वामी कामा*
*पचारे तिन्हे पेखि चारनू रामा*

*ऐसी प्रकार "सगत रासो " के रचयिता गिरधर आसिया ने एक कपित लिख कर यह दर्शाया है कि युद्ध मे किन किन योद्धाओ ने भाग लिया।

उन्होंने लिखा है कि खमनोर नामक स्थान पर युद्ध हुआ राणा प्रताप की ओर से राजा रामशाह तंवर , ओर उसके दस सरदार आदि युद्ध मे काम आये*

बीकानेर के महाराणा पृथ्वीराज राठौड़ ने रामा सांदू के बलिदान पर एक डिंगल में गीत लिखा

इस युद्ध के ऊपर रामा जी सांदू ने  एक गीत लिखा जो महाराणा

 प्रताप द्वारा बहलोल खा लोदी के वध का सजीव वर्णन किया गया था ।

डॉ पुरषोत्तम लाल मेनारिया ने इतिहास से प्रमाणित करके उल्लेख किया है कि प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थ में उन्हें यह जानकारी के रूप में लिखी हुई मिली कि हल्दी घाटी में स . 1632 श्रावण बदी सातम राणा प्रताप सिंह जी कछवाहों मोनसिंघ सु बेढ़ तीण माह काम आया
1 सोनिगरा मोनसिंघ अखेरात
2 राठौड़ रामदास जेतमलोत ,
3 राजा राम सा तंवर गवालेर रो धणी
4 डोडियो भीम साडावत
5 पड़िहार सेठ
6 *सांदू रामा जी धरमावत*

इस प्रकार 6 प्रमुख सेनानायक युद्ध मे काम आय उसमें रामा सांदू जी सांदू भी महत्वपूर्ण स्थान रखते थे । कुछ ऐतिहासिक दशतावेजो में यह उलेख मिलता है कि हल्दी घाटी युद्ध मे  रामा जी सांदू घायल हुए थे । उनका उपचार किया गया । तथा वे महाराणा प्रताप के साथ निरंतर छापा मार युद्ध मे सेनानायक की तरह युद्ध मे मुगल सेना का सामना करते हुए देबारी में वीरगति को प्राप हुए थे  । एसी प्रकार मध्यकाल में रामा जी सांदू महान कवि के साथ साथ महान सेना नायक की तरह वीर गति को प्राप्त कर चारण जाती की कीर्ति को बढ़ा कर इतिहास में अमर हो गए



चारणाचार पत्रिका उदयपुर
सुल्तान सिंह देवल 

चारणो के गढपति (गढविर) पद का एक अनुठा उदाहरण


*शूरविर चारण ठाकुर कौलसिंह जी रतनु का प्राणोत्सर्ग*

चारण गढपति थे और वे गढ की रक्षा मे राह चलते भी अपना धर्म व मर्यादा समझकर मरना कबूल कर लेते थे। चारण का सत्य संभाषण व गढरक्षा का मर्यादित धर्म अप्रतीम शौर्य के साथ साथ हजारो वर्षो तक बडी शालीनता के साथ निर्वाहन कीया जाना देवी माता हिंगलाज की शक्ति से हो सका है। ईसलीए एसे उदाहरण सम्पूर्ण जगत मे केवल चारण राजपूत के सनातन मे ही मिलते है।

जोधपुर महाराजा मानसिंह के समय बीहारीदास खीची नामक राजपूत के एक अपराध पर महाराजा बडे क्रुद्ध हुए और उसे गीरफ्तार करने का आदेश दीया।खीची ने अपनी मृत्यु के भय से भागकर साथीण ठाकुर शक्तिदान भाटी की हवेली मे जाकर शरण मांगी ,भाटी ने उसे शरण मे रखा।
महाराजा ने बीहारीदास को वापीस सौंपने के कई संदेश भेजे परंतु शक्तिदान भाटी ने बीहारीदास को वापीस सोंपने का ईनकार कर दीया। मानसिंह ने कहा एसी हरकत कानाना ठाकुर भोमकरण ने की थी,जीसका परीणाम उसने भुक्ता,वही हस्र तुम्हारा भी होगा।शक्तिदान भाटी ने कहा भोमा तो बाई थी ,परंतु ये शक्तिदान तो भाई है अर्थात मर्द है। आपकी सेना का बडा स्वागत करुंगा।

महाराजा के लीए अब युद्ध करना अनिवार्य हो गया ।परंतु तब भी वे भाटीयो से युद्ध का बचाव चाहते थे।तभी मानसिंह ने अंतीम विकल्प चारण को चुना *चौपासनी ठाकुर कौलसिंह रत्नु* को भाटी को समझाने हेतु भेजा।

हवेली मे आगमन पर भाटी ने चारण का स्वागत कीया।कौलसिंह रत्नु ने राजा मानसिंह का क्रोधभरा संदेश कह सुनाया।युद्ध का विनाशकारी परीणाम भी बताया,और राजनैतीक द्रष्टि से समझाया।चारण की बात खत्म होते ही शक्तिदान भाटी ने कहा की "आप मुजे बताओ बाजीसा ईस समय मेरा धर्म बीहारीदास को शरण देना है या उनको छोडना ?"
 कौलसिंह चारण ने कहा "आपका धर्म शर्णागत की रक्षा करना है, परंतु मे तो ईसलीए केह रहा हु की ईस युद्ध मे आपकी ही हानी होगी"
भाटी ने कहा "हानी तो क्या मे धर्म रक्षार्थ प्राणोत्सर्ग के लीए भी तैयार हु"
ठाकुर कौलसिंह रतनु ने महाराजा मानसिंह को कहा था की मे कुछ भी कर के भाटी को समझा कर ही आउंगा
तब उन्होने कहा वापीस लौटकर राजा को कहने के लीये मेरे पास कोई शब्द नही है,ईसलीए मै भी अब आपके साथ रहुंगा ।

हवेली का दरवाजा बंद कर दीया गया चाबीया चारण कौलसिंह को दी गई।

*गढपति के लीए यह समय बडा विकट और दुरघर्ष पूर्ण होता है गढ ,महेल या हवेली (राजनीवास) के रनीवास की सुरक्षा व संरक्षण का संपूर्ण दायीत्व रहता है।*
*चारण के 'गढपति' महत्वपूर्ण पद के लिए शूरविर, धीर राजनीतीग्न,दुरदृष्टा,विवेकी,तीव्र निर्णय शक्ति,राजघराने के साथ अटूट श्रध्धा,विश्वास व रण कौशल्य आदी गुण चारण मे होने आवश्यक होते थे।चारण को सदैव राज्य की* *सामाजीक,राजनैतीक,आर्थीक व आन्तरिक मामलो की पूर्ण जानकारी रहती है।शासक अपनी गुप्त बाते सबसे गुप्त रख शकता था लेकीन गोपनीय से गोपनीय बात के लीये भी चारण से कोई पर्दा न था।*
आलीशान हवेली की चाबीया कौलसिंह के हाथ मे थमाकर शक्तिदान भाटी ने कहा, धर्म रक्षा का समय आ गया है बाजीसा  अब ये हवेली का दायीत्व आपका ,ये हवेली आपकी हुई और सेना से कहा सैनीको केशरीया धारण करो ,हमे विजय नही अमरत्व चाहीए।

ठाकुर कौलसिंह रतनु केशरीया धारण कर हाथ मे दो धारी तलवार लेकर कभी हवेली के बुर्जो पर जाते तो कभी नीचे मेदान मे आते वे भुखे शेर की तरह ईधर से उधर घूम रहे थे।

जोधपूर की सेना ने हवेली पर धावा बोला। सेना ने हवेली को चारो और से घेर दीया।तोपो और बंदुको की गर्जना से शहर थर्रा गया। पास पडोस वाले आवास छोड कर सुरक्षीत जगाह पर भाग खडे हुए। हवेली के मुख्य द्वार पर तोप लगा दी गई और हवेली का दरवाजा तोडने को तोप के गोले गरज उठे। दरवाजे के चीथडे उडने वाले थे,परंतु हवेली का दरवाजा कौन खोले ?हवेली अब कौलसिंह रतनु की थी। भाटी सेना मुकाबला करने मे कमजोर पड रही थी और दरवाजा टुटने का भी खतरा था। स्थिती को भली भाँती देखकर कौलसिंह जी चारण ने जय माताजी ,जय भवानी केह कर हवेली का दरवाजा खोला। तोप का पहला गोला कौलसिंह  की जंघा पर लगा। उनका पैर एक तरफ और कौलसिंह दुसरी तरफ!!! यह होता है चारण के गढपती (गढविर) पद का कार्य।चलती हुई मौत को अपने गले लगाने का धर्म। चारण सदैव तलवारो के बीच रहेते थे और तलवारे से कटकर विरगति पाते थे।ईस युद्ध मे सर्व प्रथम ठाकुर कौलसिंह जी रत्नु विरगती प्राप्त हुए।

संदर्भ:-
*चारण दीगदर्शन*
*बांकीदास री ख्यात*

*जयपालसिंह (जीगर बन्ना) थेरासणा*

*नोंध:-ईस पोस्ट को अधीक से अधीक शेर करे परंतु मेरे नाम के साथ छेडछाड ना करे।*