क्षत्रिय चारण

क्षत्रिय चारण
क्षत्रिय चारण

रविवार, 24 दिसंबर 2017

सांयावत झुला

चारणो की वरसडा शाखा मे एक महापुरुष हुए जीनका नाम ठाकुर आल्हा जी वरसडा। आल्हा जी को कच्छ के शासक ने एक बडा सा झुले पर बैठा सोने का हाथी  भेंट कर दरबार मे सन्मान दीया। तब से वे झुला कहलाए। ठाकुर आल्हा जी झुला को गुजरात के महान शासक सिध्धराज जयसिंह ने उनकी विध्वानता की एवज मे लीलछा सहीत 12 ग्राम का पट्टा जागीर मे दीया। आल्हाजी की वंश परंपरा मे विक्रम संवत 1632 भाद्रपद विद नवमी को जागीर ग्राम लीलछा में स्वामी दास जी के घर  महात्मा भक्त कवि श्री सांयाजी झुला का जन्म हुआ । उनके भाई का नाम भांयाजी था । सांयाजी की संतान सांयावत झुला कहलाये और भांयाजी की संतान भांयावत झुला कहलाये।

नागदमण और रुक्मणीहरण नामक दो महान ग्रंथ के रचियता सांयाजी ईडर के राज दरबारी कवी थे। 

 महात्मा सांयाजी अनन्य कृष्ण भक्त थे।
 

सांयाजी झुला कुवावा के जागीरदार थे। राव कल्याणमलजी ने विक्रम संवत 1661 मे सायांजी झुला को 2 हाथी और लाखपसाव सहीत आलीशान कुवावा ग्राम जागीरी मे दीया। सांयाजी को 8 -घोडे , 6 -हाथी, और उठण / बेठण रो कुरब की ताजीम के सन्मान ईडर दरबार से एनायत थे।  सांयाजी को बीकानेर राजा रायसिंह जी ने लाखपसाव और 2 हाथी,जोधपुर राजा गजसिंह जी ने 13 शेर सोने का थाल,एवं लाखपसाव और ईडर से 6 बार लाख पसाव का सन्मान प्राप्त हुआ था । सांयाजी ने अपनी जागीर कुवावा में गोपीनाथ मंदिर , मंठीवाला कोट, किला(गढ) तथा बावड़ियां बनवाई थी ।  कुवावा के कीले मे उनका निवासस्थान(खन्डेर अवस्था मे) आज भी विध्यमान है  ।  ईडर रीयासत मे मुडेटी के ठाकुर ने अंग्रेजो से बचने के लीए ईस कीले मे शरण ली थी।और सांयावतो ने उनकी रक्षा कर अंग्रेजो से उनका बचाव कीया था।ईस अहेसान को आज तक मुडेटी वाले मानते है।

आज सांयाजी झुला के वंशज कुवावा के जागीरदार है और उनकी दया से कुवावा मे बहोत समृध्धी है।

कुछ सायावत झुला वागड प्रदेश (राजस्थान)से जुड़े हुए थे तो उनको वागड मे जागीरी प्रदान हुई । वे कुवावा से वहाँ जा बसे,आज वागड(राजस्थान)मे साँयावत झुला के
नरणिया,मकनपूरा,
माकोद,गामडा,चूंडावाडा,ठिकाने है।
जीवन के अन्तिम वर्षों में ब्रजभूमि जाते वक्त मार्ग में श्रीनाथद्वारा में श्रीनाथ दर्शन करने गये। वहां इन्होंने तेर सेर सोने का थाल प्रभु के चरणों में धरा था। जो आज भी विद्यमान है। उस दिन से आज तक वहां तीन बार आवाज पड़ती है “जो कोई सांयावत झूला हो वो प्रसाद ले जावें”।
मृत्यु के अंतिम दिन मथुरा में एक हजार गाये ब्राह्मणों को दान दी तथा हजारों ब्राह्मण गरीबों को भोजन करवाकर हाथ जोड़कर श्री कृष्णचंद जी की जय कर इन्होंने महाप्रयाण किया।

एक समय शाम को सांयाजी ईडर नरेश राव कल्याणमल जी की कचहरी में बेठे थे अचानक सांयाजी स्थिर हो गए और दोनों हाथों को जोर-जोर से रगड़ने लगे। सांयाजी की इस विचित्र क्रिया को देख राजा सहित सभा अचंभित रह गयी। थोड़े समय पश्चात सांयाजी हाथ रगड़ते बंद हुए और दोनों हाथो को अलग किये तो दोनों हाथ काले हो गए थे व हाथो में छाले हो गए थे। इन हाथो को देखकर राजा और प्रजा और ज्यादा अचंभित हुए। राणा जी से रहा नहीं गया तो सांयाजी से पूछा कि आप एक घडी तक स्तब्ध होकर क्या कर रहे थे जिससे आपकी हथेलियां काली पड गई और छाले पड गए, कृपा कर कविराज हमें बतावे।

तब सांयाजी बोले हे रावजी इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, द्वारिका में श्री रणछोड राय की आरती उतारते समय पुजारी के हाथ में पकड़ी आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय के वाघो (कपड़ो) में आग लग गई तो इस घटना से मुझ सेवक को दृष्टीगोचर होने से दोनों हाथो से रगड़ कर आग बुझाने से मेरे हाथ काले हुए और छाले पड़े।

इस वक्तव्य पर राणाजी को विश्वास नहीं हुआ तो दुसरे ही दिन अपने विश्वासपात्र राठोड चांदाजी को इस घटना की सत्यता का पता लगाने के लिए द्वारिका भेजा। चांदाजी ने द्वारिका पहुंचते ही भगवान के दर्शन किये और जिस काम से आये उसका पता लगाने हेतु पुजारी से मिले और पूछा कि पुजारी जी गत मार्गशीर्ष मास की सुदी ग्यारस की शाम को रणछोड राय जी के मंदिर में कोई घटना घटी? तब पुजारी बोला में तो क्या पूरा शहर जानता हे कि आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय को नए धारण करवाए कपड़ो में आग लग गई और उस आग को सांयाजी ने अन्दर आकर बुझाई थी।

यह सुनकर चांदोजी बोले क्या उस दिन सांयाजी यंहा थे? तब गुगलिया महाराज बोले आश्चर्य क्यों कर रहे हो उस दिन सांयाजी यहाँ थे इतना ही नहीं वो तो संध्या आरती समय हमेशा यहाँ हाजिर होते हें।

यह बात सुनकर चांदोजी को और ज्यादा आश्चर्य हुआ कि ईडर की सभा में बैठकर दुसरे रूप में आग बुझाई वो तो ठीक हे मगर हमेशा यहाँ हाजिर होते हे यह तो नई घटना हुई।

शाम को आरती का समय हुआ झालरों की आवाज होने लगी चांदाजी आडी-तिरछी नजरें घुमाने लगे कि आज देखता हूँ सांयाजी को, इतने में द्वारकाधीश के द्वार की साख के पीछे सोने की छड़ी पकडे सांयाजी को खड़े देखा।

आरती पूरी हुई, सांयाजी ने सोने की जारी द्वारकाधीश के सामने रखी रणछोड़जी ने अपने हाथ लंबे कर जारी मे से जलपान किया। यह प्रत्यक्ष प्रमाण देख चांदोजी सत्य मानने लगे की ईडर में बैठे हुए सांयाजी ने ठाकुरजी के जलते हुए वाघे बुझाए थे।

एक साथ दो जगह सांयाजी की उपस्तिथि का वर्णन चांदाजी से सुनकर राव कल्याण ने उठकर सांयाजी के पांव पकड़ लिए।

धन्य हे चारण समाज जिसमे ईश्वर स्वरुपा साँयाजी ने जन्म लिया।


-जयपालसिंह (जीगर बऩ्ना)सिंहढायच ठि.थेरासणा

चारण-राजपूत परंपरा

*चारण- राजपूत परंपरा*

राजा रावल हरराज भाटी जैसलमेर
कहते है की मेरा राज्य व धन वैभव सभी कुछ चले जावे उसकी मुझे चीन्ता नही है परन्तु मेरे घर से चारण (भांजो) का जाना मुझे स्वीकार नही है-

कुछ पंक्तीया:,

> *जावैगढ,राज,भलै,भल जावै। राज गयां नह सोच रत्ती।।*
*गजबढ है चारण गयां सूं।पलटे मत,वण छत्रपति।।*

अर्थ:-रावल हरराज भाटी कहते है मेरा गढ चला जावे, राज्य सत्ता चली जावे, ईन सबके चले जाने पर मुझे लेश मात्र की चींता नही है। पर अगर चारण गया तो अनर्थ कल्पात हो जायेगा। ईसलीए राजपूतो तुम राजा बनने पर मदान्ध हो कर चारण को कभी मत भुलना।।

> *धू धारण केवट छत्रिधर्म रा। कळयण छत्रवट भाळ कमी।।*
*व्रछ छत्रवाट प्राजळण वेळा।ईहग सींचणहार अमी।।*

अर्थ:- जीस प्रकार ध्रुव अटल है उसी प्रकार चारण अटल व अडीग रहकर क्षत्रिय धर्म नीभाते है,वे जहा कही भी क्षात्रधर्म की कमी देखते है उसे तत्काल पुरा करते है। ये चारण क्षात्रवट रुपी वृक्ष को सींचकर सदैव हराभरा रखने वाले है।

> *आद छत्रियां रतन अमोलो। कुळ चारण अपसण कीयो।।*
*चोळी-दांमण सम्बध चारणां। जीण बळ ,यळ रुप जीयौ।।*

अर्थ:- शक्ति ने चारण नामक जाति उत्पन्न करकर क्षत्रियो को यह अमूल्य रत्न प्रदान कीया है। ईस पावन सम्बन्ध -'चोलीदामन'(चारण - राजपूत, भांजा-मामा) का स्थापित किया है ,अब तुम ईनको साथ रखकर अपने बल से जीवित रहो।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

दसोंदी / चारण

*दसोंदी / चारण*

राजपूताना के रजवाडो के राजा  चारणो को वंदनीय ,पुजनीय मानते थे,और बडा मान सम्मान देते थे। राज दरबार मे चारण का स्थान उच्च और सन्माननीय था।

>"दसोंदी" यानी देशी राज्य की सभी आवक मे से दस वे हीस्से का हकदार(चारण)।

>दसोंदी चारण का राज दरबार मे उच्च स्थान और प्रतीष्ठीत व्यकत्तीत्व था, उनको पुरे राज्य मे राजा जेसा ही मान-सन्मान मीलता था।

 >राजकुमारीओ के रीश्ते की बात करने दसोंदी चारण जाते थे।

> चारण युद्ध भुमी मे हरावल टुकडी (पुरी सेना का नेतृत्व करने वाली टुकडी,जो युद्ध मे सबसे आगे होती थी) मे सबसे आगे खडे रेहते थे,और अपना शौर्य प्रदर्शन करते विरता से युद्ध लडते थे।

चारण-राजपूत की दसोंदी की जोडी ईस प्रकार है :,

सौदा - सीसोदीया
रोहडीया - राठोड
दुरसावत(आढा) - देवडा चौहान
सिंहढायच - प्रतीहार/पढीयार
रत्नु - भाटी
नांदु - खीचि

>दसोंदी जोड पर एक दोहा प्रचलीत है,

*।।सौदा अने सीसोदीया, रोहड ने राठोड,*
*दुरसावत ने देवडा, यादव रत्नु जोड।।*

*जीगर बन्ना थेरासणा*

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

गढपति/गढविर/गढवी/चारण

*चारण/गढपति/गढवी*

चारण गढपति था , गढ दुर्ग का स्वामी था, परंतु  राज कुल का आवास भी वही उसके साथ था। राज पुत्री के विवाह अवसर पर धर्म अौर मर्यादा का व्यवधान पैदा हो गया।आंगातुक परीणय कर्ता राज पुत्र के लिए तोरण वन्दना पर गढवी का दुर्ग उसकी बहेन का आवास कहा जाता था। गढवी का आवास राजपुत्रो मे बहेन का आवास कहलाता है। तब आने वाला दुल्हा उस चारण के दुर्ग पर तोरण वन्दना कैसे करे? ईस व्यावधान के निराकरण के लीए सर्व सम्मती से निर्णय लीया गया कि तोरण वन्दना मे हाथी या घोडा गढपति स्वयं का होना होगा,जिससे मानो गढपति की आग्या से वह राजपुत्र के वहा विवाह की स्वीकृत है। तथा गढवी के आवास का दोष भी नही लगता। उस काल मे राज सत्ता पूर्ण रुप से धर्म सत्ता व धर्म आधारित थी जीसका संवाहक एक मात्र गढपति(चारण)था।

शत्रु सेना की वीजय पूर्ण संभावना पर गढपति का ही कर्त्तव्य रहता था की वह रनिवास/रानीवास की सुरक्षा करे और आवश्यक होने पर वह उन्हे सुरक्षीत स्थान पर ले जाकर संरक्षण प्रदान करे।शत्रु सेना के दुर्ग पर आक्रमण करने पर दुर्ग के द्वार बंद कर दीये जाते थे ओर कीले की चाबीया गढपति को सोंप दी जाती थी।

बहुत समय पश्चात राजपुत्रो केे मनोदशा मे परीवर्तन आया उन्होने गढपति के अधीकारो को सीमीत करने का सोचा। गढपति(चारण) के पास देवी का आशीर्वाद तो था ही जबकी उनके पास अब रण कौशल व पर्याय सैनीक शक्ति थी।
राजपुत्रो ने कहा की हमे सैनीको पर बहुत अधीक व्यय करना पडता है ईसलीए अब हम समस्त आय का दसवा भाग आपको अदा करने मे समर्थ है (जीससे चारण *दसोंदी* केहलाए)अब आप 10-12 गांव लेकर अपना पृथक स्वतंत्र क्षेत्र स्थापित करले ।उस क्षेत्र व आपकी उस प्रजा पर हमारा किसी भी प्रकार का हक-हकुक नही होगा(जैसे वर्तमान मे कीसी देश का हाई कमीशन होता है, कुछ वैसा ही समझे।)
आपका वह क्षेत्र आपका स्वयं का अपना शासन होगा,तथा उस पर जारी कीये गये कानूनो का हम प्रसन्न चीत्त से बीना कीसी तर्क के पालन करेंगे। *चारण 30-40 बीघा से लेकर 30-40 गाँव के स्वामी तक होते थे।*(ईसी लीए मध्यकालीन युग मे चारणो के नाम के आगे ठाकुर और नाम के पीछे सिंह शब्द का प्रयोग होता था)

चारणो ने वक्त की नजाकत को समझकर इस प्रस्ताव स्वीकार लीया। राजपुत्रो ने चारणो को गढ से पृथक कर कुछ गांवो का स्वामीत्व सोंप दीया।गढवी के समस्त अधीकार यथावत रहे गढपतियो को राज्य का वैभव व गढपति की योग्यता अनुसार कुछ गांव जागीरी मे दीये गये जो गढवी का अपना शासन क्षेत्र कहलाता था। उन गांव का क्षेत्र स्वशासन जो शासन/सांसण के नाम से वर्तमान तक जाने जाते है।

चारण राजपूत का प्रगाढ सम्बन्ध तथागत कायम रहा चारणो ने तोरण वंदना की मर्यादा को यथारुप रखते हुए राजपुत्रो और अपने वीवाह रश्म मे तोरण वंदना मे हाथी या घोडा चारण अपना स्वयं का कार्य मे लेते थे।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

क्षत्रिय गढपति चारण

 गढविर चारण गढ की रक्षा मे राह चलते भी अपना धर्म व मर्यादा समझकर मरना कबूल कर लेते थे।चारण का सत्य संभाषण व गढरक्षा का मर्यादित धर्म अप्रतिम शौर्य के साथ साथ हजारो वर्षो तक बडी शालीनता के साथ निर्वहन किया जाना देवीमाता हिंगलाज की शक्ति से ही संभव हो सका है। ईसलीए एसे उदाहरण सम्पूर्ण जगत मे केवल एक   चारण राजपूत के सनातन मे ही मीलते है ।

चारण गढपति होता था ईसलीए जैसलमेर का कोई भी शासक गद्दीनशीन होने पर सर्वप्रथम उसके दरबारी चारण का राज्याभिषेक करता था। वह राज्य छत्र पहले चारण गढपति के सिर पर धारण करवाया जाता था,तत्पश्चात भाटी शासक के सिर पर वही छत्र धारण करवाया जाता था । जीससे जैसलमेर भाटी राजवंश 'छात्राला भाटी' कहलाते। ईसका अर्थ है की चारणो के हाथ से दीये गये राज्य का संचालन उनकी आग्या से कर रहे है।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

सोमवार, 13 नवंबर 2017

symbol of charan cast










युद्ध भुमि के विर "चारण"

क्षत्रित्व का पाठ पढाने वाला चारण कीतना विर होगा?यह बात सहज ही सबके मस्तीस्क मे घुमती है।तब ईस प्रश्न का उतर जानने के लीये चारण की वीरता के अद्रीतीय उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है ताकी चारण से अनभीग्य लोग भी ईसे जानकर अपने संजोये भ्रम से मुक्त हो सके।

सन 1311 में सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी ने जालौर के राजा कान्हड़दे सोनगरा पर आक्रमण किया तब उसके सेनापति सहजपाल गाडण ने असाधारण शौर्यप्रदर्शन कर वीरगति पाई थी ईस युद्ध मे आसाजी बारहठ के साथ ग्यारह चारण भी थे ।

महाराणा हम्मीर के साथ चारण बारुजी सौदा 500 घोड़े लेकर अल्लाउद्दीन खिलजी से लड़े थे और खिलजी के मरने के पश्चात हम्मीर को चित्तौड़ की गद्दी पर बैठाने में सफलता पाई थी।
ईन्ही बारुजी के पुत्र पालमसिंह सौदा राणा रायमल के साथ मुसलमानो की सेना मे युद्ध लडते हुए "पाडलपौल"पर चित्तोड के कीले मे शोर्यता दीखाये विरगति को प्राप्त हुए थे।

जगदीश मंदीर की रक्षा हेतु और बादशाह ने उदयपुर पर जब धाबा बोला तब नरुजी सौदा द्वार पर लडते लडते  विरगति को प्राप्त हुए उनका सिर कटने के बाद भी धड लडा और ३०० कदम चल कर लडने के बाद वो गीरे।

सेणोंद के स्वामी जमणाजी सौदा ने पीली खांट मे  मांडु के बादशाह से शौर्यतापुर्वक लडते हुए १५८४ मे विरगती को प्राप्त हुए ।ईनके पुत्र का नाम राजविरसिंह था ईन्होने भी युद्ध की कई होलीया खेली। एक कडवा सत्य है की राणा सांगा के साथ अगर विर सौदा चारण न होते तो खानवा के युद्ध के पराजय के बाद सांगा प्राण त्याग देते।

प्रसिध्द हल्दीघाटी की लड़ाई में महाराणा प्रताप के साथ सेना में हरावल मे रामाजी सांदू व सौदा बारहठ जैसाजी व केशवजी भी लड़े थे    अदभूद वीरता दिखाकर वीरों के मार्ग गमन किया था।और भी बहोत से चारण हल्दीघाटी मे लडे थे जीसमे सुरायजी टापरीया,गोरधन बोग्सा आदी बहोत से विर चारण थे।

सन 1573 में अकबर द्वारा गुजरात आक्रमण के समय वीरवर हापाजी चारण मुगल सेना में तैनात थे।

मेवाड महाराणा जगतसिंह की सेना ने सिरोही पर हमला कर दीया ये युद्ध बनास नदी के तट पर हुआ मेवाड की और से चारण सिरदार महाराणा जगतसिंह के समर्थ सलाहकार ठाकुर गोपालदास सिंहढायच और चारण खेमराज दधवाडीया सेना मे तैनात थे ।

सिरोही के राव सुरताण और अकबर के मध्य सन 1583 में लड़े गए युध्द में दुरसा आढा मुगल सेनाकी और से तथा दुदाजी आसिया ने सिरोही की और से लड़ाई में भाग लिया था।

जालौर के किले में वि.सं. 1760 जोधपुर के मानसिंह को महाराजा भीमसिंहजी की सेनाने घेरलिया था, तब महाराजा मानसिंह के साथ मारवाड़के तत्कालीन समयके प्रसिध्द सतरह (17) चारणों ने वीरतापूर्वक लड़ करके अपने स्वामी की रक्षा की थी, उनमें भी जुगतो जी वणसूर नें तो सावधानी पूर्वक दो बार किले के घेरे से बाहर निकल कर एक बार अपने घर के गहणें बेच कर तथा दूसरी बार अपनें छोटे पुत्र को खारा के मंहन्त के गिरवी रख कर धन की व्यवस्था भी महाराजा मानसिंह को सुलभ करवाई थी। मानसिंहजी जुगतो जी वणसूर को काकोसा कह कर सम्बोधित किया करते थे।

हाजर जुगतो हुओ, पीथलो हरिंद पुणीजै।
दोनां महा दुबाह, सिरे फिर ऊंम सुणीजै।।
मैघ अनै मेहराम, ईंनद ने कुशलो आखो।
भैर बनो भोपाल, सिरै चौबीसो साखो।।
पनौ नै नगो नवलो प्रकट, केहर सायब बडम कव।
महाराज अग्र घैरै मही, सतरह जद रहिया सकव।।
ऊपरोक्त 17 चारणो ने मान सिह जी के साथ जालोर के घैरे मे साथ दिया। सभी के नाम निम्न प्रकार हैं।
1-जुगतीदानजी वणसूर, 2-पीथसिंहजी सांदू, 3-हरिसिंहजी सांदू, 4-भैरूंदानजी बारठ, 5-बनजी नांदू, 6-ऊमजी बारठ, 7-दानोजी बारठ, 8-ईंदोजी रतनू, 9-कुशल़सिंहजी रतनू, 10-मेघजी रतनू, 11-मयारामजी रतनू, 12-पनजी आसिया, 13-नगजी कविया, 14-भोपसिंहजी गाडण, 15-नवलजी लाल़स, 16-केसरोजी खिड़िया, 17-सायबोजी सुरताणिया

मेवाड़ के मैंगटिया गांव के गाडण सुलतान जी के पुत्र भगवानदास और भैरूंदास बड़े वीर पुरुष व महाराणा की सेना में सिपहसालार के पद पर थे, तथा महाराणा की और से बादशाह को दी जाने वाली सैनिक टुकड़ी में दिल्ली में तैनात थे, दिल्ली की कैद से मराठा छत्रपतिजी महाराज शिवाजी को निकालने में मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह का हाथ होने पर उसे षडयंत्र पूर्वक मारने की योजना को इन दोनों गाडण भाईयों ने सफलता पूर्वक विफल कर दिया था तब मिर्जा राजा रामसिंह ने इन दोनो को हरमाड़ा गांव की जागीर प्रदान कर आमेर के पास ही बसाया था।

हररुपजी आशीया ने महाराणा प्रताप की पाग को न जुक ने देकर अकबर के खीलाफ युद्ध छेडा थे और हररुप जी आशीया ने महाराणा प्रताप की और से युद्ध मे अद्वीतीय विरता दीखाई थी  १२ अंगरक्षको को मारने के बाद अकबर के सुबे अजीज को चारण ने अपने अश्व से उसके हाथी के सुंठ पर चढ कर भाले से वार कर ऐक ही झटके मे सुबे को मार गीराया था और शहीद हुए थे।

सिध्द अलूनाथजी कविया के बड़े पुत्र नरुजी कविया ने आमेर के राजा मानसिंह के साथ में उड़िसा में कटक के युध्द में कतलू खाँ नामक पठान इक्का को द्वंद युध्द में मार कर वीरगति पाई थी।
दुसरा युद्ध कतुलखां लोदानी के वीरुद्ध जोधपुर की सेना मे ईन्होने विरता दीखाई थी, और कुंवर जगतसिंह के प्राण बचाये थे।ईस युद्ध मे नरुजी के पुत्र जैसाजी कविया भी सम्मलीत थे।
ईन्ही के वंशज विजयसिंह ने अमिरखां पठान के वीरुद्ध  दांता ठाकुर गुमानसिंह (गुमानसिंह युद्ध छोडकर भाग गया तब पुरा युद्ध का मोरचा विजयसिंह ने संभाला था) के युद्ध मे बहोत से मुस्लीमो के सर काटे तभी वीजयसिंह का बेटा ईस युद्ध मे कटकर गीरा बदले मे उन्होने नवाब का सर धड से अलग कीया था ।
इस विषय का एक प्रसिध्द वीर गीत भी बनाया हुआ है। कविया वंश की शाखा का वीरता के गीत का एक भाग देखिये।

पाँच कम साठ नरपाल रा पोतरा आठ पीढीयां मांही काम आया।।

अर्थात पचपन वीर पुरुष आठ पीढीयों में लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुऐ।

इतिहास प्रसिध्द कविया करणीदान जी अहमदाबाद की लड़ाई में जोधपुर महाराजा अभयसिंह के साथ हरावल में थे, तथा पहले दिन की लड़ाई में जोधपुर की सेना को दबती देखकर कविया करनीदान जी ने अभयसिंह जी को कहकर सेना के मोर्चे दूसरी जगह लगवाये थे और जीत हासिल करने में कामयाब रहे थे और जीत कर घर आने पर सूरज-प्रकास और विरद-सिणगार की रचना की थी।

गांव केड़ की ढाणी के किशनाजी बारहठजी नें मांढण के युध्द में शेखावतों के साथ मिलकर मुगलों व मित्रसेन अहीर की सेना को हराया था व स्वंय वीरगति को प्राप्त होने पर उनके पुत्र ईश्वरदानजी को बिसाऊ ठाकुर श्यामसिंह जी ने श्यामपुरा की जागीर प्रदान की थी।

दलपत बारहठ बीकनेर की सेना मे मराठो से १७५५ मे अपने पुत्र विजा के साथ लडते लडते विरगति को प्राप्त हुए थे।

बडलु के युद्ध मे आसोपा ठाकुर शिवनाथसिंहजी के जोधपुर आक्रमण मे भदोरा ठाकुर गिरवरसिंह सांदु कंधे से कंधा मीलाए थे।ईस भीसण युद्ध मे बहोत से सैनीक रणभुमी छोडकर भाग गए परंतु ठाकुर गिरवरसिंह ने अडीखम होकर युद्ध भुमी को रक्तरंजीत कीया था।

जोधपुर के जसवन्तसिंह प्रथम शाहजहा के विद्रोह शाहजादो को परास्त करने १७१५ मे उज्जेन गये ईस सेना मे हरावल मे जसराज बारहठ इतने पराक्रम के साथ लडे के एक टक होकर जसवन्तसिंह उनको देखने रणभुमी मे ठहर गये।

सौराष्ट मे सात गाँवो के स्वामी वीहलदेव चारण का मुख्य ठीकाना आंबरडी पर अहमदाबाद के बादशाह ने चढाई की ,तब उनके साथ ११ चारण मीत्रो ने मुस्लीम सेना के साथ तलवार को ऱक्त से नहलाकर युद्ध कीया बहोत से मुस्लीमो को काटकर १२ चारण विरगती को प्राप्त हुए थे।

राजकोट की दरबार कचेरी मे एक पठान ने तलवार सहीत दरबार मे कदम रखा और राजा को मारने हेतु वो जेसे ही आगे बढा उससे पहले जैसाजी चारण जो दरबारी थे उन्होने पलक जबकते ही पठान को कटारी से गले पर वार कर वही ढेर बना दीया।

१६३९ मे जामनगर मे अकबर नी सेना के सुबेदार  मीरजा अजीज कोका ने युद्ध करने हेतु सेना भेजी तब जामनगर के विर चारण परबतजी वरसडा जामनगर के प्रत्येक गांव जाकर नौजवानो की ऐक टुकडी तैयार की तो दुसरी और ईशरदासजी के पुत्र गोपालदासजी बारहठ  ने अपने भाईओ और परीजनो सहीत 500 तुम्बेल चारणो की टुकडी का स्वयं नेतृत्व करते हुए रण भुमी मे पहोंचे ये युद्ध मे करीब ७००से ज्यादा चारणो ने विरता पुर्वक युद्ध कीया और वीजयी हुए ईस युद्ध को "भुचरमोरी" के युद्ध से जाना जाता है

वर्तमान समय में भी अपने जातीय संख्यांक के अनुसार अनेकानेक चारण बन्धुओ की सेना के तीनों अंगों में तैनाती है तथा देश की सेवा में अपना कर्तव्य-निर्वहन कर रहे हैं।
संदर्भ:
>विरवीनोद
>चारण दीगदर्शन
>चारण ऩी अस्मीता

*जीगर बन्ना थेरासणा*