क्षत्रिय चारण

क्षत्रिय चारण
क्षत्रिय चारण

सोमवार, 1 जनवरी 2018

देवजाती /देववंशी चारण

🔴 *देववंशी/देवजाती- चारण*


>कलम व तलवार की धनी चारण जाति ने अपनी साहित्हिक प्रतिभा व संगठनात्मक शक्तियों का संयोजन स्वतंत्रता समर में भाग लेकर किया। चारण जाति की उत्पति दैवी से हुई है, वह खुद भारत वर्ष मे शासक(जागीरदार) जाती थी, चारण जाती  बडे बडे शासको की सहयोगी बनकर,अधिक रस लेकर उनकी सहायता करती थी।

>राजपूत राज्यो में चारणों का स्थान बड़ा उच्च था, चारण ही इतिहासकार,
कुशलयोद्धा, राजकवि व मंत्री हुआ करते थे ।

>भागवत में नारद को ब्रह्मा ने जो सृष्टिक्रम बतलाया उसमें चारणों का उल्लेख मिलता है, यहा नारद, ब्रह्मा, शिव, राक्षस, सूतगण, देवता, असुर, चारण, खग, मृग, सर्प, गंधर्व, उरग, पशु, पित्तर, सिद्ध, विद्धाधर, वृक्षादि की गणना की गई है
इससे स्पष्ट होता है कि चारण मानवेतर सृष्टि माने गये है, यह जाति किसी समय स्वर्ग में रहती थी, और देव स्वर्ग में भी इनका समावेश था।

> *चारण के देवजाती होने के सेंकडो प्रमाण है जो नीम्न है:-*

: देवसर्ग के विभाग और स्वरुप:
हीम वर्ष के सम्पूर्ण स्वर्ग मे देव जाती के लोग रहा करते थे जो आठ सर्गो मे विभक्त थे।ईस सर्गो मे किसी  मे एक,किसी में दो और किसी में तिन जाति समूह है। ईस प्रकार से आठ सर्गो की कुल 14 देवजातीयाँ वहाँ निवास करती थी। देव जाति के ईन सर्गो के बारे में श्रीमदभागवत पुराण के तृतीय स्कंद के दसवें अध्याय मे लिखा है-

देवसर्गश्चाष्टविधो  विबुधा पितरोसुराः।
गन्धर्वाप्सरस सिद्ध यक्ष रक्षांसि चारणाः।।२७।।
भूत,प्रेता,पिशाचाश्य विध्याध्रा किन्नरादयाः।
दशैत विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः।।२८।।

देवताओ के ८ जाती सर्ग है-
१. बीबुध,२.पितर,३.असुर,५गंधर्व,अप्सरा(ईन दोनो का एक सर्ग),५.यक्ष,राक्षस(ईनदोनो का एक सर्ग),६.भूत,प्रेत,पीशाच(ईन तीनो का एक सर्ग),७.सिद्ध,चारण,विध्याधर(ईन तीनो का एक सर्ग),८.किन्नर ।
वरुण अथवा ब्रह्मा ने जीन दो अथवा तीन को साथ मे स्थान दिया है,उनका एक सर्ग अर्थात् समूह माना है।

>चारण की उत्तपति और वीकास के बारे मे वेद और पुराणो की गुंज ईसके अति प्राचीन होने की साक्षी देते है।फलत:यह बात स्वतः प्रमाणीत है कि ईस जाती का प्रादुभार्व एक एसे समय मे हो चुका था जब वर्ण व्यवस्था का नामोनिशान तक नही था।
यह जाती दक्ष पुत्री व शिव की सन्तान है। सति व शिव  के ये सरंक्षण मो वेदो की रुचाएँ रचने के कारण चारण रुषी कहलाते थे। सति के 52 पुत्र(गण)जो दक्ष यग्य मे सति की सुरक्षा मे साथ थे। सति के यग्य कुण्ड मे कुदकर स्वयं को जला देने पर ईन गणो (चारणो) ने दक्ष का वध कर अप्रतिम शौर्य का परीचय दीया। जीस पर उपस्थित देव दानव आदी ने ईनको विर पद से विभूषित किया तब से विर कहलाये ।

> वनपर्व 441 श्रीमद् भागवत में चारण जाति का आठ प्रकार के देवसर्ग में परिगणित किया गया है, *'चारयन्ति कीर्तिमति चारण'* जो स्वयं धर्म के पथ पर आरूढ़ होकर दूसरों को धर्मोंत्थान की ओर प्रेरित करे वो चारण।

>चारण शब्द योद्धा,सिद्ध, कवि इत्यादि पदों के योग में प्रयुक्त होता है जिससे इनकी सिद्धि सम्पन्नता तथा युद्ध कुशलता व काव्य प्रतिभा साक्षित होती है, देवसर्ग में परिगणित यह चारण जाति देवताओ के साथ विचरण करती थी।

> महाभारत के भीष्मपर्व 20वें अध्याय का 16वॉ श्लोक चारणों की महत्ता को प्रदर्शित करता है, महाभारत में उल्लेख है - कौरव, पांडवों की दोनों तरफ की सेना और अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार देखकर श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन, तू देवी की स्तूति कर, वह तुझे विजय देगी , उस समय अर्जुन ने स्तुति की -
*तुष्टि: पुष्टि धृति दीप्ति, श्रद्धादित्यविदिनी ।*
*मूर्ति मति मतां संख्य, वीक्षसे सिद्ध चारणै:।।*

> रामायण काल में इनका निवास लंका में वाल्मीकि ने बतलाया है। ये अपने विशिष्ट गुण, कर्म के कारण चतुवर्णात्मक भारतीय समाज में भिन्न निरूपित हुए हैं। देव यज्ञों में सम्मिलित होना इनका अनिवार्य अधिकार था।

>महाभारत काल में इस जाति ने यायावार नामक आश्राम धर्म की स्थापना कर एक यायावरीय उपनिषद की रचना भी की, इस जाति के लोंगों के गोत्र भी आष होने से इनका ऋषियों से संबंध सिद्ध होता है।

सुन्दरकाण्ड 42, 161 : सद् धर्म की साधना में योगदान चारणों के जीवन का लक्ष्य रहा है।

>बालकाण्ड सर्ग 45, श्लोक 33 *"इमं आश्रम मृत्यसृज्य सिद्ध चारण सेविते हिमवत् शिखरे रम्ये तपस्तेये महायता:"* हनुमान जब सीता का अन्वेषण कर रहे थे तो उन्हें सीता के धर्म परिग्रह का वृत चारणों से ज्ञात हुआ था(सुन्दरकाण्ड 44 सर्ग 29) ,चारणों ने ही सीता के कुशल वृत के मंगल संवाद से संतप्त हनुमान के संताप को नष्ट किया था।

>पंचम् वेद महाभारत में भी चारण जाति के प्रसंग उल्लेख हुए है (आदि पर्व 126/11 ) अर्जुन ने इन्द्र से अनुमति प्राप्त कर सिद्ध चारण से शासित लोक में जाकर पांच वर्षों तक शस्त्र विद्या का अभ्यास किया था।

> *यजुर्वेद* में चारण शब्द का प्रयोग ऋचा में हुआ है, यजुर्वेद अध्याय 6, मंत्र 2 -
*"यथोमां वाच कल्याणी मानवदानि जनेभ्य:*
*राजन्याभ्यां शूद्राय चार्चाय च स्वत्व चारणयं"*
 इस ऋचा में चार वर्णों से पृथक उस चारण शब्द का उल्लेख यह बतलाता है कि इन चार वर्णों से भिन्न उद्गम वाली यह एक विशिष्ट जाति थी।

> ईसके अतिरिक्त
पद्मपुराण,गणेशपुराण,आदीत्यपुराण,
विष्णुपुराण,शीवमहापुराण,स्कन्दपुराण,
मत्स्यपुराण,ब्रह्मपुराण,वायुपुराण,
वामनपुराण,
भविष्यपुराण,मार्कण्डेय पुराण,विष्णुपुराण,
गर्गसंहिता,मनुस्मृति,अमरकोष,
हलायुधकोष,अष्टाध्यायी,नालन्दाविशाल
शब्दसागरकोष,भगवदगोमंडल,कालीदासकी रचनाओ,हर्ष चरीत्र,प्रसन्नराघव,राजतरंगिणी,अनर्ध राघव,पृथ्वीचन्द्र चरीत्र ईत्यादी जैसे प्राचीन महान ग्रंथो मे, और तो और बहोत से जैन ग्रन्थो मे भी चारणो के बारे में दिया गया उल्लेख ध्यान देने लायक है ।

चारणो का शस्त्र-शास्त्र,पर असाधारण अधीकार था,
अपीतु चारण क्षत्रीय वर्णस्थ माने जाते है।

*जीगर बन्ना थेरासणा

टोकरा गाँव का ईतीहास (ठीकाना)

*टोकरा गाँव का ईतीहास(ठीकाना)*

*शाख:-सौदा बारहठ*

जामनगर(सौराष्ट्र) के खौङ गाँव के चक्खङा शाखा के नरहा चारण के घर 13वीं सदी में एक कन्या का जन्म हुआ। जन्म के समय ही मुँह में दाँत होने के कारण ब्राह्मणों ने इसे अनिष्टकारी व अमँगलकारी बताया। भयवश इस कन्या को बूर(गाङ) दिया गया। ये सब करने के 15 दिन बाद यह कन्या जीवित मिली। इस चमत्कार के बाद यह कन्या आमजन के बीच बूरुङी(बिरवङी) नाम से शक्ति रूप में पूजित हुई।

चारणों की २४ मूल शाखाओं में 'मरुत' नाम की शाखा है; जिसकी 'पेटा' नाम की उपशाखा है। पेटा की ५२ उपशाखाओं में से एक कापल(कायपल) है। कायपल उपशाखा में आदिपुरुष के नाम से 'देथा' उपशाखा चली। माँ बिरवङी जी का विवाह इसी देथा उपशाखा के 'भूयात जी अथवा करमसेण जी' (अलग-अलग विद्वानों के मतानुसार) जो कि बनासकांठा क्षेत्र में 'संखङो' ग्राम का स्वामी था, से हुई।

सीसोदे गाँव के गुहील राजा 'हम्मीर' उस समय अपने पूर्वजों का मेवाङ राज्य पुन: प्राप्त करने के लीए संघर्ष कर रहे थे; जो कि १३०३ ईस्वी में अल्लाऊद्दीन खिलजी द्वारा हथिया लिया गया था।
हम्मीर ने माँ बिरवङी जी की शरण प्राप्त की। माँ बिरवङी ने हम्मीर को विजय वरदान दिया और अपने पुत्र बारू देथा को 500 घोङों सहित हम्मीर की मदद के लिए भेजा।
बारू ने हम्मीर को वचन दिया कि विजय प्राप्त होने पर वह हम्मीर को 500 घोङे मूल्य के बदले देगा। और यदि पराजय होती है, तो ये 500 घोङे हम्मीर को बिना किसी मूल्य के भेंट कर देगा। उक्त सौदे के कारण बारू; 'बारू सौदा' के नाम से जाना गया और आज भी इसके वंशज *'सौदा'*उपटंक से जाने जाते हैं। विजयोपरांत हम्मीर ने बारू को अपना 'गढपति' और 'दसोंदी' बनाया; बैठक की ताजीम, 7 हाथी, 500 घोङे, पैरो मे सोने के लंगर,सैंकङों ऊँट व गाय-भैंसें, अतुल्य स्वर्ण भँडार व 12 गाँवों की सोना नीवेस जागीर  अर्पित कर पग-पूजा की तथा अपने वंशजों को सौदा चारणों से कभी ना विरचने(विमुख होने) की सौगंध दिलवाई।


हम्मीर से ही मेवाड के शासको को राणा बीरुद प्राप्त है ।

राणा हम्मीर ने चित्तौङ के कीले में माँ बिरवङी जी का भव्य मंदिर बनवाया। आज भी हम्मीर के सिसोदिया वंशज माँ बिरवड़ी जी को बिरवड़ी माँ, बाण माता, अन्नपूर्णा आदि नामों से कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
बारू सौदा कालांतर में राणा हम्मीर के साथ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी बारू की कुल परंपरा में सौदा पालम, सौदा बाजूड़, सौदा जमणा, सौदा अमरसिंह, सौदा नरू, सौदा जैसा, सौदा केशव ओनाडसिंह ,कृष्णसिंह ,केशरीसिंह,जोरावरसिंह,प्रतापसिंह सहित और भी बगोत से विर सौदा सिरदारों ने मेवाड़ी स्वातंत्र्य और स्वाभिमान की रक्षा हेतु कई युद्धो मे भाग लेकर वीरगति का वरण किया।

बारु सौदा को राणा हम्मीर द्वारा प्राप्य उमराव पद और 12 गांवो की जागीरी मे से ही एक ठीकाना है *पाणेर*।
 बारुजी सौदा की 4थी  पीढी मे पाणेर के दीपसिंह सौदा को ईडर के राजा राव विरमदेव ने ईडर में हठोज गांव की जागीर एनायत की।
 श्री दीपसिंह जी के सुपुत्र ठाकुर देवीदानजी सौदा को 1657 चैत्र सुद 3 के दीन ईडर के राजा राव कल्याणमलजी ने *टोकरा* जागीर अर्पीत करके लाखपसाव देकर दरबार मे बैठक की ताजीम सम़्मान पूर्वक दी।

ठाकुर देवीदानजी अपने छोटे भाई को हठोज देकर  टोकरा मे स्थिर हुए।
फीर से ठाकुर साब को दांता के महाराजा वाघजी की और से राणोल की जागीर प्राप्त हुई थी।

ठाकुर साब ने कोई पाठशाला मे से शीक्षा प्राप्त नही की थी ,मां सरस्वती उनके कंठ मे थी। वे खुद गुजराती,मारवाडी,डींगल,और पींगल भाषाओ के प्रखर जानकार थे । उनके तीन पुत्र थे:
१)मेशदानजी,२)मेघसिंहजी,३)रघुनाथजी
ईडर और दांता राज्य के दरबार मे ठाकुर साब का स्थान उच्च और सन्मान भरा था । ईन दोनो राज्य से समय समय पर ठाकुर साब को पुरस्कृीत कीया जाता था ।
ठाकुर साब ने भक्ति रस मे बहोत से काव्य लीखे थे,पर उनका साहीत्य आज अप्राप्य है। ७० वर्ष की आयु मे ठाकुर साब देवीदानजी का स्वर्गवास टोकरा मे हुआ।
उनके वंशज टोकरा के जागीरदार है और चारण समाज मे खानदान कहलाते है।

ठाकुर साब देवीदानजी के वंशजो मे
बहोत से विद्धवान कवि और शूरविर हुए।

जीनके नाम नीम्न है:
ठाकुर ईन्द्रसिंह जी सौदा,
ठाकुर गोपालसिंह जी सौदा,
ठाकुर छत्रसिंह जी सौदा,
ठाकुर उमेदसिंह जी सौदा,
ठाकुर खुशालसिंह जी सौदा,
ठाकुर जसराजसिंह जी(जसजी) सौदा,
ठाकुर आईदान जी सौदा,
ठाकुर हरनाथ जी सौदा(हठोज)

साबरमती नदी के उपर नीर्माण होने वाले धरोई बांध के भराव क्षेत्र में टोकरा गांव आ जाने से इस ठीकाने के सौदा बारहठो को अन्यत्र जमीने सरकार श्री तरफ से एनायत की गई।

आज भी श्री ठाकुर साब देवीदान जी सौदा के वंशज उनकी उच्चतम ख्याती की गवाही देते हुए  मेवा-टोकरा,विरेश्वर-टोकरा,गढवी कंपा और हठोज ईत्यादी गांवो मे सोनानीवेस जमीनो के स्वामी है।

जय माँ बीरवडी जी
जय माँ करणी जी
जय माँ आवड जी

*जयपाल सिंह (जीगर बन्ना) थेरासणा*

रविवार, 24 दिसंबर 2017

सांयावत झुला

चारणो की वरसडा शाखा मे एक महापुरुष हुए जीनका नाम ठाकुर आल्हा जी वरसडा। आल्हा जी को कच्छ के शासक ने एक बडा सा झुले पर बैठा सोने का हाथी  भेंट कर दरबार मे सन्मान दीया। तब से वे झुला कहलाए। ठाकुर आल्हा जी झुला को गुजरात के महान शासक सिध्धराज जयसिंह ने उनकी विध्वानता की एवज मे लीलछा सहीत 12 ग्राम का पट्टा जागीर मे दीया। आल्हाजी की वंश परंपरा मे विक्रम संवत 1632 भाद्रपद विद नवमी को जागीर ग्राम लीलछा में स्वामी दास जी के घर  महात्मा भक्त कवि श्री सांयाजी झुला का जन्म हुआ । उनके भाई का नाम भांयाजी था । सांयाजी की संतान सांयावत झुला कहलाये और भांयाजी की संतान भांयावत झुला कहलाये।

नागदमण और रुक्मणीहरण नामक दो महान ग्रंथ के रचियता सांयाजी ईडर के राज दरबारी कवी थे। 

 महात्मा सांयाजी अनन्य कृष्ण भक्त थे।
 

सांयाजी झुला कुवावा के जागीरदार थे। राव कल्याणमलजी ने विक्रम संवत 1661 मे सायांजी झुला को 2 हाथी और लाखपसाव सहीत आलीशान कुवावा ग्राम जागीरी मे दीया। सांयाजी को 8 -घोडे , 6 -हाथी, और उठण / बेठण रो कुरब की ताजीम के सन्मान ईडर दरबार से एनायत थे।  सांयाजी को बीकानेर राजा रायसिंह जी ने लाखपसाव और 2 हाथी,जोधपुर राजा गजसिंह जी ने 13 शेर सोने का थाल,एवं लाखपसाव और ईडर से 6 बार लाख पसाव का सन्मान प्राप्त हुआ था । सांयाजी ने अपनी जागीर कुवावा में गोपीनाथ मंदिर , मंठीवाला कोट, किला(गढ) तथा बावड़ियां बनवाई थी ।  कुवावा के कीले मे उनका निवासस्थान(खन्डेर अवस्था मे) आज भी विध्यमान है  ।  ईडर रीयासत मे मुडेटी के ठाकुर ने अंग्रेजो से बचने के लीए ईस कीले मे शरण ली थी।और सांयावतो ने उनकी रक्षा कर अंग्रेजो से उनका बचाव कीया था।ईस अहेसान को आज तक मुडेटी वाले मानते है।

आज सांयाजी झुला के वंशज कुवावा के जागीरदार है और उनकी दया से कुवावा मे बहोत समृध्धी है।

कुछ सायावत झुला वागड प्रदेश (राजस्थान)से जुड़े हुए थे तो उनको वागड मे जागीरी प्रदान हुई । वे कुवावा से वहाँ जा बसे,आज वागड(राजस्थान)मे साँयावत झुला के
नरणिया,मकनपूरा,
माकोद,गामडा,चूंडावाडा,ठिकाने है।
जीवन के अन्तिम वर्षों में ब्रजभूमि जाते वक्त मार्ग में श्रीनाथद्वारा में श्रीनाथ दर्शन करने गये। वहां इन्होंने तेर सेर सोने का थाल प्रभु के चरणों में धरा था। जो आज भी विद्यमान है। उस दिन से आज तक वहां तीन बार आवाज पड़ती है “जो कोई सांयावत झूला हो वो प्रसाद ले जावें”।
मृत्यु के अंतिम दिन मथुरा में एक हजार गाये ब्राह्मणों को दान दी तथा हजारों ब्राह्मण गरीबों को भोजन करवाकर हाथ जोड़कर श्री कृष्णचंद जी की जय कर इन्होंने महाप्रयाण किया।

एक समय शाम को सांयाजी ईडर नरेश राव कल्याणमल जी की कचहरी में बेठे थे अचानक सांयाजी स्थिर हो गए और दोनों हाथों को जोर-जोर से रगड़ने लगे। सांयाजी की इस विचित्र क्रिया को देख राजा सहित सभा अचंभित रह गयी। थोड़े समय पश्चात सांयाजी हाथ रगड़ते बंद हुए और दोनों हाथो को अलग किये तो दोनों हाथ काले हो गए थे व हाथो में छाले हो गए थे। इन हाथो को देखकर राजा और प्रजा और ज्यादा अचंभित हुए। राणा जी से रहा नहीं गया तो सांयाजी से पूछा कि आप एक घडी तक स्तब्ध होकर क्या कर रहे थे जिससे आपकी हथेलियां काली पड गई और छाले पड गए, कृपा कर कविराज हमें बतावे।

तब सांयाजी बोले हे रावजी इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं, द्वारिका में श्री रणछोड राय की आरती उतारते समय पुजारी के हाथ में पकड़ी आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय के वाघो (कपड़ो) में आग लग गई तो इस घटना से मुझ सेवक को दृष्टीगोचर होने से दोनों हाथो से रगड़ कर आग बुझाने से मेरे हाथ काले हुए और छाले पड़े।

इस वक्तव्य पर राणाजी को विश्वास नहीं हुआ तो दुसरे ही दिन अपने विश्वासपात्र राठोड चांदाजी को इस घटना की सत्यता का पता लगाने के लिए द्वारिका भेजा। चांदाजी ने द्वारिका पहुंचते ही भगवान के दर्शन किये और जिस काम से आये उसका पता लगाने हेतु पुजारी से मिले और पूछा कि पुजारी जी गत मार्गशीर्ष मास की सुदी ग्यारस की शाम को रणछोड राय जी के मंदिर में कोई घटना घटी? तब पुजारी बोला में तो क्या पूरा शहर जानता हे कि आरती की बाती से गिरे तिनके के कारण रणछोड राय को नए धारण करवाए कपड़ो में आग लग गई और उस आग को सांयाजी ने अन्दर आकर बुझाई थी।

यह सुनकर चांदोजी बोले क्या उस दिन सांयाजी यंहा थे? तब गुगलिया महाराज बोले आश्चर्य क्यों कर रहे हो उस दिन सांयाजी यहाँ थे इतना ही नहीं वो तो संध्या आरती समय हमेशा यहाँ हाजिर होते हें।

यह बात सुनकर चांदोजी को और ज्यादा आश्चर्य हुआ कि ईडर की सभा में बैठकर दुसरे रूप में आग बुझाई वो तो ठीक हे मगर हमेशा यहाँ हाजिर होते हे यह तो नई घटना हुई।

शाम को आरती का समय हुआ झालरों की आवाज होने लगी चांदाजी आडी-तिरछी नजरें घुमाने लगे कि आज देखता हूँ सांयाजी को, इतने में द्वारकाधीश के द्वार की साख के पीछे सोने की छड़ी पकडे सांयाजी को खड़े देखा।

आरती पूरी हुई, सांयाजी ने सोने की जारी द्वारकाधीश के सामने रखी रणछोड़जी ने अपने हाथ लंबे कर जारी मे से जलपान किया। यह प्रत्यक्ष प्रमाण देख चांदोजी सत्य मानने लगे की ईडर में बैठे हुए सांयाजी ने ठाकुरजी के जलते हुए वाघे बुझाए थे।

एक साथ दो जगह सांयाजी की उपस्तिथि का वर्णन चांदाजी से सुनकर राव कल्याण ने उठकर सांयाजी के पांव पकड़ लिए।

धन्य हे चारण समाज जिसमे ईश्वर स्वरुपा साँयाजी ने जन्म लिया।


-जयपालसिंह (जीगर बऩ्ना)सिंहढायच ठि.थेरासणा

चारण-राजपूत परंपरा

*चारण- राजपूत परंपरा*

राजा रावल हरराज भाटी जैसलमेर
कहते है की मेरा राज्य व धन वैभव सभी कुछ चले जावे उसकी मुझे चीन्ता नही है परन्तु मेरे घर से चारण (भांजो) का जाना मुझे स्वीकार नही है-

कुछ पंक्तीया:,

> *जावैगढ,राज,भलै,भल जावै। राज गयां नह सोच रत्ती।।*
*गजबढ है चारण गयां सूं।पलटे मत,वण छत्रपति।।*

अर्थ:-रावल हरराज भाटी कहते है मेरा गढ चला जावे, राज्य सत्ता चली जावे, ईन सबके चले जाने पर मुझे लेश मात्र की चींता नही है। पर अगर चारण गया तो अनर्थ कल्पात हो जायेगा। ईसलीए राजपूतो तुम राजा बनने पर मदान्ध हो कर चारण को कभी मत भुलना।।

> *धू धारण केवट छत्रिधर्म रा। कळयण छत्रवट भाळ कमी।।*
*व्रछ छत्रवाट प्राजळण वेळा।ईहग सींचणहार अमी।।*

अर्थ:- जीस प्रकार ध्रुव अटल है उसी प्रकार चारण अटल व अडीग रहकर क्षत्रिय धर्म नीभाते है,वे जहा कही भी क्षात्रधर्म की कमी देखते है उसे तत्काल पुरा करते है। ये चारण क्षात्रवट रुपी वृक्ष को सींचकर सदैव हराभरा रखने वाले है।

> *आद छत्रियां रतन अमोलो। कुळ चारण अपसण कीयो।।*
*चोळी-दांमण सम्बध चारणां। जीण बळ ,यळ रुप जीयौ।।*

अर्थ:- शक्ति ने चारण नामक जाति उत्पन्न करकर क्षत्रियो को यह अमूल्य रत्न प्रदान कीया है। ईस पावन सम्बन्ध -'चोलीदामन'(चारण - राजपूत, भांजा-मामा) का स्थापित किया है ,अब तुम ईनको साथ रखकर अपने बल से जीवित रहो।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

दसोंदी / चारण

*दसोंदी / चारण*

राजपूताना के रजवाडो के राजा  चारणो को वंदनीय ,पुजनीय मानते थे,और बडा मान सम्मान देते थे। राज दरबार मे चारण का स्थान उच्च और सन्माननीय था।

>"दसोंदी" यानी देशी राज्य की सभी आवक मे से दस वे हीस्से का हकदार(चारण)।

>दसोंदी चारण का राज दरबार मे उच्च स्थान और प्रतीष्ठीत व्यकत्तीत्व था, उनको पुरे राज्य मे राजा जेसा ही मान-सन्मान मीलता था।

 >राजकुमारीओ के रीश्ते की बात करने दसोंदी चारण जाते थे।

> चारण युद्ध भुमी मे हरावल टुकडी (पुरी सेना का नेतृत्व करने वाली टुकडी,जो युद्ध मे सबसे आगे होती थी) मे सबसे आगे खडे रेहते थे,और अपना शौर्य प्रदर्शन करते विरता से युद्ध लडते थे।

चारण-राजपूत की दसोंदी की जोडी ईस प्रकार है :,

सौदा - सीसोदीया
रोहडीया - राठोड
दुरसावत(आढा) - देवडा चौहान
सिंहढायच - प्रतीहार/पढीयार
रत्नु - भाटी
नांदु - खीचि

>दसोंदी जोड पर एक दोहा प्रचलीत है,

*।।सौदा अने सीसोदीया, रोहड ने राठोड,*
*दुरसावत ने देवडा, यादव रत्नु जोड।।*

*जीगर बन्ना थेरासणा*

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

गढपति/गढविर/गढवी/चारण

*चारण/गढपति/गढवी*

चारण गढपति था , गढ दुर्ग का स्वामी था, परंतु  राज कुल का आवास भी वही उसके साथ था। राज पुत्री के विवाह अवसर पर धर्म अौर मर्यादा का व्यवधान पैदा हो गया।आंगातुक परीणय कर्ता राज पुत्र के लिए तोरण वन्दना पर गढवी का दुर्ग उसकी बहेन का आवास कहा जाता था। गढवी का आवास राजपुत्रो मे बहेन का आवास कहलाता है। तब आने वाला दुल्हा उस चारण के दुर्ग पर तोरण वन्दना कैसे करे? ईस व्यावधान के निराकरण के लीए सर्व सम्मती से निर्णय लीया गया कि तोरण वन्दना मे हाथी या घोडा गढपति स्वयं का होना होगा,जिससे मानो गढपति की आग्या से वह राजपुत्र के वहा विवाह की स्वीकृत है। तथा गढवी के आवास का दोष भी नही लगता। उस काल मे राज सत्ता पूर्ण रुप से धर्म सत्ता व धर्म आधारित थी जीसका संवाहक एक मात्र गढपति(चारण)था।

शत्रु सेना की वीजय पूर्ण संभावना पर गढपति का ही कर्त्तव्य रहता था की वह रनिवास/रानीवास की सुरक्षा करे और आवश्यक होने पर वह उन्हे सुरक्षीत स्थान पर ले जाकर संरक्षण प्रदान करे।शत्रु सेना के दुर्ग पर आक्रमण करने पर दुर्ग के द्वार बंद कर दीये जाते थे ओर कीले की चाबीया गढपति को सोंप दी जाती थी।

बहुत समय पश्चात राजपुत्रो केे मनोदशा मे परीवर्तन आया उन्होने गढपति के अधीकारो को सीमीत करने का सोचा। गढपति(चारण) के पास देवी का आशीर्वाद तो था ही जबकी उनके पास अब रण कौशल व पर्याय सैनीक शक्ति थी।
राजपुत्रो ने कहा की हमे सैनीको पर बहुत अधीक व्यय करना पडता है ईसलीए अब हम समस्त आय का दसवा भाग आपको अदा करने मे समर्थ है (जीससे चारण *दसोंदी* केहलाए)अब आप 10-12 गांव लेकर अपना पृथक स्वतंत्र क्षेत्र स्थापित करले ।उस क्षेत्र व आपकी उस प्रजा पर हमारा किसी भी प्रकार का हक-हकुक नही होगा(जैसे वर्तमान मे कीसी देश का हाई कमीशन होता है, कुछ वैसा ही समझे।)
आपका वह क्षेत्र आपका स्वयं का अपना शासन होगा,तथा उस पर जारी कीये गये कानूनो का हम प्रसन्न चीत्त से बीना कीसी तर्क के पालन करेंगे। *चारण 30-40 बीघा से लेकर 30-40 गाँव के स्वामी तक होते थे।*(ईसी लीए मध्यकालीन युग मे चारणो के नाम के आगे ठाकुर और नाम के पीछे सिंह शब्द का प्रयोग होता था)

चारणो ने वक्त की नजाकत को समझकर इस प्रस्ताव स्वीकार लीया। राजपुत्रो ने चारणो को गढ से पृथक कर कुछ गांवो का स्वामीत्व सोंप दीया।गढवी के समस्त अधीकार यथावत रहे गढपतियो को राज्य का वैभव व गढपति की योग्यता अनुसार कुछ गांव जागीरी मे दीये गये जो गढवी का अपना शासन क्षेत्र कहलाता था। उन गांव का क्षेत्र स्वशासन जो शासन/सांसण के नाम से वर्तमान तक जाने जाते है।

चारण राजपूत का प्रगाढ सम्बन्ध तथागत कायम रहा चारणो ने तोरण वंदना की मर्यादा को यथारुप रखते हुए राजपुत्रो और अपने वीवाह रश्म मे तोरण वंदना मे हाथी या घोडा चारण अपना स्वयं का कार्य मे लेते थे।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

क्षत्रिय गढपति चारण

 गढविर चारण गढ की रक्षा मे राह चलते भी अपना धर्म व मर्यादा समझकर मरना कबूल कर लेते थे।चारण का सत्य संभाषण व गढरक्षा का मर्यादित धर्म अप्रतिम शौर्य के साथ साथ हजारो वर्षो तक बडी शालीनता के साथ निर्वहन किया जाना देवीमाता हिंगलाज की शक्ति से ही संभव हो सका है। ईसलीए एसे उदाहरण सम्पूर्ण जगत मे केवल एक   चारण राजपूत के सनातन मे ही मीलते है ।

चारण गढपति होता था ईसलीए जैसलमेर का कोई भी शासक गद्दीनशीन होने पर सर्वप्रथम उसके दरबारी चारण का राज्याभिषेक करता था। वह राज्य छत्र पहले चारण गढपति के सिर पर धारण करवाया जाता था,तत्पश्चात भाटी शासक के सिर पर वही छत्र धारण करवाया जाता था । जीससे जैसलमेर भाटी राजवंश 'छात्राला भाटी' कहलाते। ईसका अर्थ है की चारणो के हाथ से दीये गये राज्य का संचालन उनकी आग्या से कर रहे है।

*जीगर बन्ना थेरासणा*