क्षत्रिय चारण

क्षत्रिय चारण
क्षत्रिय चारण

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

मारु चारण की शाखाए

⚔ *वर्तमान में राजस्थान में बसने वाले मारू चारणो की शाखाए*⚔

1 - चांचडा
2 - झीबा
3 - जगट
4 - बोग्सा
5 - खिडिया
6 - वणसूर
7 - सामोर
8 - मूहड़
9 - आशिया
10 - लालस
11 - आढा
12 - सांदू
13 - महिया
14 - महियारिया
15 - गांगणिया
16 - सौदा
17 - मीशण
18 - गेलवा
19 - सीलगा
20 - नांदु
21 - किनिया
22 - देथा
23 - सुरतानिया
24 - भादा
25 - सिंहढायच
26 - मेहडू
27 - गाडण
28 - बाटी
29 - रतनू
30 - देवल
31 - कविया
32 - झूला
33 - वरसडा
34 - थेहड
35 - धानडा
36 - टापरिया
37 - सुंगा
38 - कुंवारिया
39 - नरा
40 - तुगंल
41 - मिकस
42-टापरीया
43 - बारहट ( रोहडिया, पालावत, अमरावत, लखावत, अखावत, बिठु, देपावत, शंकरोत, आशावत,राजसिंगोत आदी )


गणपत सिंह चारण

चारण राजपूत परंपरा श्री आवड माता

*चारण-राजपूत परंपरा*

*श्री आवड माँ*

आठवी शताब्दी मे काठीयावाड के वल्लभी पुर नगर मे सउआ शाखा के चारण मामडजी रहते थे। लौद्रवा के राजा जसभांण परमार के समकालिक बताते हुए कहा जाता है कि जसभांण मामड़जी चारण का नित्य उठ कर मुंह देखा करता था । उसे किसी ने उलाहना दिया कि जसभांण जिसका तू नित्य उठ कर मुंह देखता है वह तो निःसंतान है ! इस उलाहने से दुःखी होकर मामड़ ने हिंगलाज देवी की पैदल यात्रा सात बार का संकल्प लिया । हिंगलाज देवी ने मांमड़जी के घर शक्ति अवतार लेने का वचन दिया और ये शर्तें रखीं- कि ‘इसको किसी के आगे उजागर न करना, अपनी पत्नी को पवित्रता से रहे, खखर वृक्ष का पालना बनाये -उसे लाल रंग से रंग कर घर के ऊपर लाल ध्वजा बांध दे, प्रति दिन उठ कर सात बार नाम का स्मरण करे ।’
और चारण मामड़जी और मोहवती के घर वि.सं. 808 चैत्र शुक्ल.....मंगलवार को  देवी भगवती/हिंगलाज ने आवड़ के रूप में अवतार लिया। ये सात बहिने जो सब देवियां मानी जाती हैं।आवड बाई , जोगड बाई , तोगड बाई , होल बाई , बीज बाई , सासाई, लगु बाई ( ’खोड़ियार’ )  इन्होंने आजीवन कौमार्यव्रत धारण किया था । एक मेहरखा नामक भाई था। आवड जी सबसे बडे थे। तत्कालीन सिंध के राजा ऊमर ने इनकी सुंदरता पर मोहित होकर इनसे विवाह करने का हठ किया किन्तु इन्होंने अपने चमत्कार व कौशल से उसे मार कर वहां भाटी वंश के क्षत्रियों का राज्य जैसलमेर(माड प्रदेश) स्थापित कर दिया । अतः *ये भाटी वंश की कुलदेवी है ।*इनके विषय में अनेक किवदंतियां व चमत्कार प्रसिद्ध है ।

 परमार-क्षत्रीय ऊमर सूमरा, जो कि सूमरों का अंतिम शासक था, इस्लाम धर्म में दीक्षित हो चुका था, को मारा। इसके अतिरिक्त सतलुज नदी की एक शाखा जो राजपुताने में ‘मीठा महरांण’ कहलाती थी को तीन चल्लू में पी डाला और वह मीठे पानी का समुद्र कहा जाने वाला ‘हाकड़ा’ मरूभूमि में परिवर्तित हो गया ।

-आवड़माता के विभिन्न रूपों में आशापुरा,स्वांगीयाजी,  बीजासण, तेमड़ाराय, गिरवरराय,चाळाराय, डूगरेच्यां, अर्बुदा,नागणेच्याआदि उनके 52 अवतार है।आवडजी और ईनके 52 अवतार  चारण,राजपूत, और भी बहोत सी जातीओ की कुलदेवी है ।

  ’आवड’ जी ने हाकड़ा नामक समुद्र का शोषण कियाथा । ’आवड’ जी ने हूण सेना नायक तेमड़ा नामक राक्षस को मारा था जिसके कारण ’तेमडेराय’ कहलाई , महाराजा तणु को तनोट स्थान पर दर्शन देकर ’तनोटराय’ कहलाई। घंटियाल नामक राक्षस को मारकर ’घंटियालराय’ कहलाई ,भादरिया नामक भाटी के आग्रह पर दर्शन देने पधारी इसलिए ’भादरियाराय’ कहलाई ,काले डूंगर पर बिराजने से ’कालेडूंगरराय’ कहलाई ,पन्ना मुसलमान की रक्षा करके ’पन्नोधरिराय’ कहलाई ,एक असुर रूपेण भेंसे को मारकर माँ ने उसे देग नामक बर्तन में पकाया था, इसलिए ’देगराय’ कहलाई। आवड जी सहित सातों बहनों के नदी में नहाते वक्त यवन राजकुमार नुरन द्वारा कपड़ो को छूने के कारण माँ आवड नागण का रूप धारण कर घर लौटी थी इसलिए ’नागणेची/नागणेच्या’ कहलाई ! राजस्थान में सुगन चिड़ी को ’आवड’ माँ का रूप माना जाता है !
 ’आवड’ जी इस पृथ्वी पर सशरीर 191 साल बिराजे थे ।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

ठा.सा.नाथुसिंह जी महीयारीया

*श्री कृष्णपाल सिंह जी चहुंआण “राखी” का कविवर ठाकुर नाथूसिंहजी महियारिया(चारण) पर आलेख*

वीरत्व रै औजस्वी  कविवर ठाकुर साहब नाथूसिंह महियारिया रो नांव सुमरण करतां ई पारम्परिक वेशभूषा री ठठक में सजियोड़ी हेक ऐहडी भव्य अर विराट सख्सियत आंख्यां रै सामै उजागर हुय जावै है जिकै जीवण पर्यन्त मेवाड़ री अणमोल क्षात्र-संस्कृति नै आस्था अर गरब सूं जीवी है। वास्तव में वै क्षात्र -संस्कृति रा उद्घोषक, संवाहक अर प्रतिष्ठापक हां।

ठाकुर साहब नाथूसिंह चारण जाति री महियारिया खांप रा लाडेसर हा। महियारिया उपजाति रो आद-पुरस् मांडणजी गुजरात छोड़ मेवाड़ में आय बसग्या हा। मेवाड़ रै महाराणा उवां नै महियारी गाँव री जागीरी बख्सीस में दी ही। केसरिया मांडणजी तद् सूं महियारिया बणग्या। उणरी बाइसवीं पीढ़ी में वेलाजी विया। वेलाजी री सुन्दरबाई महियारिया री कुलदेवी रै रूप में पुजीजै।

महियारिया कुळ में घणा ई जोधा अर कवि जलम्या हां, जिकां तलवार अर कलम रै बळबुते खुद आपरौ इतिहास बणायौ है। मांडण कुळ भासकर देवीदास महियारिया पांच लाखपचाव दे’र “जग दातार” रो खिताब पायो हो। कविवर नाथूसिंह रा परदादा किसनदास, उदयपुर रै प्रसिद्ध जगदीस मिंदर नै जोयडा गांव समरपित कियो हो अर लालघाट माथै चारभुजा जी रो हेक मिंदर पण बणवायो हो। दादाजी जसकरण भी घणो जस कमायो। जसजी रै तीन बेटा में पूछेट हो ठाकुर केसरीसिंह, ठाकुर नाथूसिंह ईण ठाकुर केसरीसिंह रै घरां जलम लीधो हो।

ऩाथुसिंह जी रा पिताश्री पण ड़िंगळ रा नामी-गिरामी कवि हां। ईण तरां कवि री वंश -परम्परा घणी उजळी रैयी है।

ठाकुर नाथूसिंह महियारिया रो जलम सवंत 1948 वि. में भाद्रपद री क्रस्णां-आठम नै रोहिणी नखत में सुबै आठ बज्यां हुयौ हो। उण री माँ रामकंवर बाई, इतिहास प्रसिद्ध कवि दुरसा आढ़ा रै वंशज ठाकुर चमनसिंह (साया रौ खेड़ो) री धिया ही। कवि रै जलम रो नांव विजयसिंह हो, पण उण रा पिताजी उण नै नाथूसिंह नांव दियो हो। कवि जद फगत नो बरस रो हो तद् उण रा पिताजी रो देहांत हुग्यो हो। मां रो सरगवास होयो जद कवि तेरै बरस रो ई हो।

ठाकुर साहब री अल्पायु में ई पिता रो सायो उठ जावण सूं उण रो लालण पालण मातुश्री री देख रेख में ई वियो हो। पिताजी रै जीते थके वो फगत तीजी धोरण ताई भणिज पायो। पिताजी री मौत रै पछै माँ उण नै ले’र बांदरवाडा गाम में आयगी ही। गांव में भणाई री काई वैवस्था कोनी ही, जिण सूं आगै नेम सूं भणाई कोनी हुय सकी। पण ज्ञान रै सारूं अध्य्यन री काई खास जरुरत कोनी हुया करै। कवि री आंख्यां अर दिमाग हरमेस खुला रैवता अर उण रै माध्यम सूं वो भरपूर ज्ञान हासळ करयौ हो। ओ सच है की काव्य शास्त्र रो विधिसर अध्य्यन, मनन अर अभ्यास कोनी करयौ, पण आपरी विलक्षण ईच्छा सगति सूं जुनां गीतां, दूहा आदि रै माध्यम सूं सिरजण-कला सीख लीधी ही अर उण रै मुताबिक काव्य रचना सरू कर दीधी ही। उण री लय अर गति कवि रै मानस में हेक संस्कार रै रूप में अंकित हुयगी ही। छंद हाफैई लय रै आधार माथै बण जाता। आ ई ही उण री शिक्षा अर आ ई ही उण री दीक्षा।

ठाकुर नाथुसिंह रै समै बाळ-ब्याव री प्रथा हुवण सूं उण रौ ब्याव पण अल्पायु में ई सवंत 1957 में चैत वदी दूज नै जीतावास रै ठाकुर दलेलसिंह आशिया री बेटी फूलकंवर बाई रै सागै वियो हो। कवि रो दूजो ब्याव कड़िया गाँव रै ठाकुर रामसिंह री बेटी दाखकंवर बाई सूं वियो हो, पण उण रो बेगोई देहांत हुग्यो हो। ठाकुर साहब रै तीन बेटा अर हेक बेटी हुई, मोहन सिंह, प्रताप सिंह, महताब सिंह अर सुभाग बाई। कवि रै जीवण काळ में ई मोबी पूत मोहनसिंह अर बेटी रो सुरगवास हुयग्यो हो। पुत्र मोहन सिंह राजस्थान सरकार में प्रशासनिक अधिकारी हा अर उवां कवि री “वीर सतसई” रै सम्पादन में मबताऊ सैयोग करयो हो। कवि री धर्म पत्नी रो अचाणचक सन् 1955 ई में देहांत हुवण सूं कवि-हिरदै माथे भारी आघात लागो हो, उवां आपरी काव्य- कृति “हाड़ी शतक” पत्नी नै समरपित कर उण नै काव्यजंलि प्रदान करी हीं।

ठाकुर साहब ने काव्य सिरजण री पैली सीख उण रै पिताश्री सूं मिली ही, इण कारण कवि आपरो प्रथम गुरु उणां नै ई मानतो हो। कवि रै पत्रा -पानडां में हेक दूहो लाधो हो —

शिशुपण महीं सिखवियो, बणै दूहा विख्यात।
कुंकर हूं उरण कहो, तो सूं केहर तात।।

करजाली (मेवाड़) महाराज लक्ष्मण सिंह रा लघु भ्राता राजऋषि महाराज चतुर सिंह बावजी, कवि उण रै प्रति कृतज्ञता रा भाव कई ठौर परगट करया है। बावजी रो बैकुंठ वास हुयौ जद कवि उणां री प्रशस्ति में अनेक दूहा-गीत लिख गुरु नै सिरधा – सुमन अरपित किया हां। बानगी है–

हे चातुर आतुर हुयो, थूं हर भगत अथग्ग।
नहं जातो आतो निहच, सामो आप सुरग्ग।।

भारत रा पूर्व राष्टपति राजेंद्र प्रसाद जद उदैपुर पधारयां हां तो हल्दीघाटी रै चेतक चबूतरे माथै ठाकुर साहब उणां नै “वीर सतसई” रा कई खास खास दूहा सुणायां हां। काव़्य-पाठ सुण’र इत्ता प्रभावित विया हा कै उवां फेरु ड़िंगळ कविता श्रवण सारूं कवि नै राष्टपति भवन आवण रो मान भरियो न्युतो दिया हो। नाथुसिंह ईण छिणां नै पण आपरी लूंठी उपलब्धि मानता हां।
कवि रो खास दूहो-

हसती हौदै देखियां, तोरण चंवर ढुलन्त।
सोहै उण बिच सौगुणा, रण कट पड़ियां कंत।।

नाथुसिंह  महियारिया बोत निडर हा अर खरी खरी सुणावण में वै कदै ई नीं चूकता। उण रै हेक दुहे सूं देवगढ़ रावजी रो मदिरा पान छुड़ा दियो–

थां कतरा त्यागी हुवा, तज दीधो थां राज।
आओ चुंडा देखवा, (ई) दारू तजै न आज।।

कवि फगत आपरै काव्य में ई कायरां नै प्रताड़ित कोनी किया, बल्कि बौवार में पण इस्यो कर बतायो है। कवि री कथनी अर करणी में कोई भेद कोनी हो। रियासत विलीनीकरण रै दिनां में कवि सगळा राजावां नै चूड़ियाँ अर चुटणीं रो हेक-हेक दूहो मेल्यो हो। बानगी रूप में बूंदी नरेश री चुटणीं अठै प्रस्तुत है—

हाडो तो तिल-तिल हुवो, नकली बूंदी काज।
हिक चीरो खायां बिना, दीनी असली आज।।

कविवर महियारिया देवी करणी रा सुरसती रा उपासक हां “करणी शतक” उण री देवी भगति रो ई प्रतीक है। कवि आपरै गले में करणी जी रो सोनलियो “नावां ” सदीव धारण किया रेता। जद काव्य पाठ रै दौरान किणी दूहै के छंद री लोग बाग़ सरावणां करता के दाद देता अथवा वाह वाही करता तो वै झठ सूं “नावां” नै बारै निकाल आंख्यां सूं परस कराता। आणद रै छिणां में कवि कदै कदै कहया करता —

अन धन दिनों मोकळो, दीनो जस परिवार।
मरणो मनचायो दहै, तो करता बळिहार।।

कवि री सगळी इच्छावां भगवान् पूरी करी ही, पण मनवांछित मौत वाळी साध पूरी कोनी हुई। वै ऐहड़े सुख-सम्रद्धि वाळै वातावरण में आपरै हरिये-भरिये परवार रै बीच शांति सूं मरणो चावता। पण मनचायो मरणो उवां नै नसीब कोनी वियो। कवि रा लारला किंक बरस काफी कस्टां में बित्यां हां। उण नै उपेक्षित अर हेकलु जीवण जिवणो पड्यो। लोगां कवि नै आपरी हवेली में टुट्योडे मूढै माथै हैकळो बैठो आंसू ढळकावतो देख्यो हो। ओजस्वी कवि सचमुच दया रो पात्र लागवां लागो हो। बूढ़ापै में धरम-पत्नी री याद में अक्सर रोवता रैता।

विधना ऐहडी खोटी करी कै कालांतर में उण री प्रिय हवेली हाटां बिकगी। उण रै सुखी जीवण माथै दुखां री गैरी काळख पुतगी। घर में तंगी, पण माठै कवि आपरी हटक कोनी छोडी। लारलै दिनां घणी मुसकळ सूं वै आपरै बेटै सागै रैवणो सरूं कियो हो। छेवट उठै ई सन 1973 ई में कवि री ठाठदार जीवण-जात्रा रो अंत वियो हो अर वै अणत जातरां रा मारगु बणग्या हा। लोग बतावैं है कै ड़िंगळ रै इण महान कवि री छैली जातरां में इण्या-गिन्यां लोग ई सामल विया हा। नी सोग-सभावां अर नी सिरधा-सुमन रो अरपण। हेक महान युगचारण् कवि रो इस्यो करुणामय अंत निस्चै ई सामाजिक-सोच री खोखळ नै उजागर करै है।

ठाकुर नाथुसिंह जी री काव्य-कृतियां
1. वीर सतसई
2. हाड़ी शतक
3. झालामान शतक
4. गांधी शतक
5. करणी शतक
6. कश्मीर शतक
7. बा-बापू अर फुटकर रचनावां…

ठाकुर नाथुसिंह रो “हाड़ी शतक” हेक प्रंससापरक काव्य-कृति जरूर है, पण ईण में भी वीरत्व री स्तुति ई कवि रो अभीष्ट है।

“हाड़ी शतक” रो कथानक मेवाड़ री हेक लोक-चावी गाथा माथै आधारित है। सलूम्बर रो चुण्डावत सरदार जिण दिन हाड़ी राणी नै परणीज घरां आ वै है, उणिज दिन महाराणा रो जुद्ध-नुंतों उण नै मिळे है। ब्याव रा कंकण खुलण सूं पैलां ई उण नै जुद्ध में जावणो पड़ै है। रणखेत री दिस बईर हुवण री वेळा चुण्डावत रावत नवी-नवेळी दुलहन रै मोहवश आपरै सेवक नै हाड़ी राणी खनेँ भेज्यौ अर उण सूं प्रेम-निसाँणी लावण रो कहयो। वीरत्व री देवी हाड़ी राणी तत्काल ताड़ लियौ के रावत रो मन आपरी गोरड़ी री प्रित में सागिडो उलझयोडो लखावै है। उवै सोच्यो कै जे प्रीतम री मोह-डोर उण सूं यूई बन्धयोडी रैवैला तो वो आपरौ करतव निच्सै ई निभा कोनी सकै। जे ऐहडो वेग्यौ तो अनरथ हुय जावैला। धणी नै निसाणी तो भिज्वावणी ही, सेवक उडिकतो उभौ हो। हाड़ी राणी हेक छिण में निरणय लियो अर तलवार रै हेक झटकै सूं आपरौ माथौ बाढ़ उण नै थाळ में सजाय चूंडावत सरदार नै भेज दियो। ईण अनूठी अर विचित्र निसाँणी नै लखताई रावत उण रै मांयलो गूढार्थ समझ ऐकर तो अपराध-बोध अर सरम सूं घणो विकल वियो, पण दूजै ई छिण वो दुनै उच्छाव सूं बईर हुयग्यो। रणभूमि में पराक्रम रा अचरजकारी चमत्कार दिखाया अर छेवत वीरगत नै प्राप्त वियो।

ठाकुर साहब री नजर में हाड़ी-राणी रो अमर त्याग, लौकिक-अलौकिक सगळा त्यागां सूं घणो डिघो है। सहनाणी सीताजी ई भिजवाई ही अर हाड़ी राणी भी, पण दोनूं में श्रेष्टतर तो हाड़ी राणी रीज है–

हाड़ी सहनांणी मंही, सिर मेल्यो जिण वार।
चूड़ामणि सीता तणी, वारूं बार हजार।।

इतरो ई क्यूं, जगत-जननी पारवती नै पण हाड़ी राणी रै मरणोपरांत सुख-सुभाग रै आगळ कैलास रा सरगाउ ठाट-बाट फीका लागै है 

चारण राजपूत परंपरा

*चारण राजपूत परंपरा*

चारणो के बारे में जोधपुर(मारवाड) महाराजा मानसिंह जी चारण राजपूत सबंध के वीषय मे लीखते है-

          ।।दोहा।।
*चारण,भाई छत्रियां।जां घर खाग तियाग।।*
*खागों तीखी बायरा। ज्यां सू लाग न भाग।।*
     
          ।।छप्पय।।
*जीण पृथ्वी मे गंध। पवन मे जे सुपरसण।*
*सीतळ रस,जळ साथ।अगन मांही ज्यूं उसण।।*
*शून्य मांही ज्यां सबद। सबद मे अर्थ हलेस्वर।*
*पिंड मांही ज्या प्राण।प्रांण में ज्यां परमेश्वर।।*
*रग-रग ही रगत छायौ रहै। देह विषय ज्यां डारणां।*
*क्षत्रियां साथ नातौ छतौ। चोळी दांमण चारणां।।*

अर्थ :- "जीस प्रकार पृथ्वी के साथ सुगंध,पवन के साथ स्पर्श का ग्यान,पानी के साथ रस की शीतलता जैसे अग्नी के साथ उष्णता,शून्य मे विलीन शब्द ध्वनी,जैसे शब्द के साथ उसमे अर्थ बोध पिण्ड में जैसे प्राण है और प्राण के साथ परमेश्वर । जीस प्रकार सम्पूर्ण शरीर के साथ रक्त का सम्बन्ध है।उसी प्रकार राजपूतो के साथ चारणो का चोली दामन का तदात्म्य सम्बन्ध है।"

*जयपालसिंह (जीगर बन्ना) थेरासणा*

सोमवार, 1 जनवरी 2018

चारण - राजपूत परंपरा

*चारण-राजपूत परंपरा*

माँ शक्ति बीरवडी/वरवडी/वरुडी माता

आपसी फुट और मुस्लीम आक्रान्तकारो से पराजीत होकर और मेवाड मुस्लीमो के हाथ मे आ जाने से हम्मीर द्वारीका की तरफ जा रहे थे। रास्ते मे खौड ग्राम मे वरवडी जी के चमत्कारो की चर्चा  सुनकर वे ईनके द्वार पर आये और धर्म रक्षा की याचना की। शक्ति बरवडी जी ने राणा हम्मीर को मेवाड राज्य पुनःप्राप्त होने का आशीर्वाद दीया तथा अपने पुत्र बारु को 500 घोडो सहीत सेना तैयार कर के मेवाड हासील करने भेजा।

उस प्रसंग का एक डींगल गीत है-

*यळा चीतोडा सहे घर आसी। हु थारा दोखीयो हरु।।*
*जणणी ईसी कहु नह जायौ।कहवै देवी धीज करु।।१।।*
*रावल बापा जीसौ रायगुर।रीझ -खीज सुरपत री रुंस।।*
*दस सहंसा जैहो नह दूजौ। सकती करेै गळा रा सूंस।।२।।*
*मन साचै भाखै महमाय। रसणा सहती बात रसाळ।।*
*सरज्यो व्है अडसी सुत सरखो। पकडे लाऊँ नाग पयाळ।।३।।*
*आलम-कलम नवेखंड एळा। कैलपुरा री मींढ किसौ।।*
*देवी कहै सुण्यौ नह दुजौ । अवर ठीकांणे भूप ईसौ।।४।।*


>हम्मीर ,बारुजी को लेकर वापीस आया और युद्ध कर वीजय प्राप्त की। वीजय प्राप्त होने पर ईसकी कृतग्नता मे महाराणा हम्मीर ने बारु का भारी स्वागत कीया।
बारह गांव की जागीर प्रदान की,बैठक की ताजीम,अतुल्य स्वर्ण  जवेरात,सात हाथी और 500 घोडे भेंट कीये।
हम्मीर ने बारु सौदा के पैरो का पूजन कीया। अपने राज्य का गढपती - दसोंदी बनाया । राणा हम्मीर बारुजी को अपना बडा भाई मानते थे ।
हमीर ने अपने वंशजो को शपथ दीलाकर कहा की ईस बारु सौदा के वंशजो से सीसोदीया कभी भी वीमुख नही होंगे।
यह राज्य मेने ईनकी कृपा से प्राप्त कीया है।

ईस प्रसंग का एक डींगल गीत उल्लेखनीय है-

*बैठक ताजीम गांम गज बगसे। कव रो मोटो तोल कीयो।।*
*वडदातार हेम बारु ने। दे ईतरो पद गढपती दीयौ।।१।।*
*पौल प्रवाह करे पग पुजन। वडा आवास छोळ द्रग वेग।।*
*सिंधुर सात दोय दस सांसण । नागद्रहै दीधा ईम नेग।।२।।*
*सहंसदोय महीखी अन सुरभी।कंचन करहा भरी कतार ।*
*रीझे दीयां पांच सौ रैवत । अधपत झोका दातार।।३।।*
*कोड पसाव पेखजग कहीयौ। अधपत यों दाखे नीज ओद।।*
*श्रीमुख शपथ करे अडसी सुत। सौदा नह वरचै सीसोद।।४।।*

मेवाड के सीसोदीया ओ की आराध्य देवी मा बरवडी जी है । राणा ने  बरवडी जी को चीत्तोड आने का बुलावा भेजा। मां चीत्तोड पधारे। राणा जीने बडे मानसन्मान के साथ उनकी बहोत सेवा की, और राणा हमीर ने चीतौड मे मां शक्ती वरुडी की दया व कृपा की स्मृती मे भव्य मंदीर बनवाया,जो अन्नपूर्णा के नाम से प्रसीद्ध है।
ईन्ही बारु जी सौदा के वशंज सौदा बारहठ कहलाते है।

*जीगर बन्ना थेरासणा*

देवजाती /देववंशी चारण

🔴 *देववंशी/देवजाती- चारण*


>कलम व तलवार की धनी चारण जाति ने अपनी साहित्हिक प्रतिभा व संगठनात्मक शक्तियों का संयोजन स्वतंत्रता समर में भाग लेकर किया। चारण जाति की उत्पति दैवी से हुई है, वह खुद भारत वर्ष मे शासक(जागीरदार) जाती थी, चारण जाती  बडे बडे शासको की सहयोगी बनकर,अधिक रस लेकर उनकी सहायता करती थी।

>राजपूत राज्यो में चारणों का स्थान बड़ा उच्च था, चारण ही इतिहासकार,
कुशलयोद्धा, राजकवि व मंत्री हुआ करते थे ।

>भागवत में नारद को ब्रह्मा ने जो सृष्टिक्रम बतलाया उसमें चारणों का उल्लेख मिलता है, यहा नारद, ब्रह्मा, शिव, राक्षस, सूतगण, देवता, असुर, चारण, खग, मृग, सर्प, गंधर्व, उरग, पशु, पित्तर, सिद्ध, विद्धाधर, वृक्षादि की गणना की गई है
इससे स्पष्ट होता है कि चारण मानवेतर सृष्टि माने गये है, यह जाति किसी समय स्वर्ग में रहती थी, और देव स्वर्ग में भी इनका समावेश था।

> *चारण के देवजाती होने के सेंकडो प्रमाण है जो नीम्न है:-*

: देवसर्ग के विभाग और स्वरुप:
हीम वर्ष के सम्पूर्ण स्वर्ग मे देव जाती के लोग रहा करते थे जो आठ सर्गो मे विभक्त थे।ईस सर्गो मे किसी  मे एक,किसी में दो और किसी में तिन जाति समूह है। ईस प्रकार से आठ सर्गो की कुल 14 देवजातीयाँ वहाँ निवास करती थी। देव जाति के ईन सर्गो के बारे में श्रीमदभागवत पुराण के तृतीय स्कंद के दसवें अध्याय मे लिखा है-

देवसर्गश्चाष्टविधो  विबुधा पितरोसुराः।
गन्धर्वाप्सरस सिद्ध यक्ष रक्षांसि चारणाः।।२७।।
भूत,प्रेता,पिशाचाश्य विध्याध्रा किन्नरादयाः।
दशैत विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः।।२८।।

देवताओ के ८ जाती सर्ग है-
१. बीबुध,२.पितर,३.असुर,५गंधर्व,अप्सरा(ईन दोनो का एक सर्ग),५.यक्ष,राक्षस(ईनदोनो का एक सर्ग),६.भूत,प्रेत,पीशाच(ईन तीनो का एक सर्ग),७.सिद्ध,चारण,विध्याधर(ईन तीनो का एक सर्ग),८.किन्नर ।
वरुण अथवा ब्रह्मा ने जीन दो अथवा तीन को साथ मे स्थान दिया है,उनका एक सर्ग अर्थात् समूह माना है।

>चारण की उत्तपति और वीकास के बारे मे वेद और पुराणो की गुंज ईसके अति प्राचीन होने की साक्षी देते है।फलत:यह बात स्वतः प्रमाणीत है कि ईस जाती का प्रादुभार्व एक एसे समय मे हो चुका था जब वर्ण व्यवस्था का नामोनिशान तक नही था।
यह जाती दक्ष पुत्री व शिव की सन्तान है। सति व शिव  के ये सरंक्षण मो वेदो की रुचाएँ रचने के कारण चारण रुषी कहलाते थे। सति के 52 पुत्र(गण)जो दक्ष यग्य मे सति की सुरक्षा मे साथ थे। सति के यग्य कुण्ड मे कुदकर स्वयं को जला देने पर ईन गणो (चारणो) ने दक्ष का वध कर अप्रतिम शौर्य का परीचय दीया। जीस पर उपस्थित देव दानव आदी ने ईनको विर पद से विभूषित किया तब से विर कहलाये ।

> वनपर्व 441 श्रीमद् भागवत में चारण जाति का आठ प्रकार के देवसर्ग में परिगणित किया गया है, *'चारयन्ति कीर्तिमति चारण'* जो स्वयं धर्म के पथ पर आरूढ़ होकर दूसरों को धर्मोंत्थान की ओर प्रेरित करे वो चारण।

>चारण शब्द योद्धा,सिद्ध, कवि इत्यादि पदों के योग में प्रयुक्त होता है जिससे इनकी सिद्धि सम्पन्नता तथा युद्ध कुशलता व काव्य प्रतिभा साक्षित होती है, देवसर्ग में परिगणित यह चारण जाति देवताओ के साथ विचरण करती थी।

> महाभारत के भीष्मपर्व 20वें अध्याय का 16वॉ श्लोक चारणों की महत्ता को प्रदर्शित करता है, महाभारत में उल्लेख है - कौरव, पांडवों की दोनों तरफ की सेना और अर्जुन को युद्ध के लिए तैयार देखकर श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि हे अर्जुन, तू देवी की स्तूति कर, वह तुझे विजय देगी , उस समय अर्जुन ने स्तुति की -
*तुष्टि: पुष्टि धृति दीप्ति, श्रद्धादित्यविदिनी ।*
*मूर्ति मति मतां संख्य, वीक्षसे सिद्ध चारणै:।।*

> रामायण काल में इनका निवास लंका में वाल्मीकि ने बतलाया है। ये अपने विशिष्ट गुण, कर्म के कारण चतुवर्णात्मक भारतीय समाज में भिन्न निरूपित हुए हैं। देव यज्ञों में सम्मिलित होना इनका अनिवार्य अधिकार था।

>महाभारत काल में इस जाति ने यायावार नामक आश्राम धर्म की स्थापना कर एक यायावरीय उपनिषद की रचना भी की, इस जाति के लोंगों के गोत्र भी आष होने से इनका ऋषियों से संबंध सिद्ध होता है।

सुन्दरकाण्ड 42, 161 : सद् धर्म की साधना में योगदान चारणों के जीवन का लक्ष्य रहा है।

>बालकाण्ड सर्ग 45, श्लोक 33 *"इमं आश्रम मृत्यसृज्य सिद्ध चारण सेविते हिमवत् शिखरे रम्ये तपस्तेये महायता:"* हनुमान जब सीता का अन्वेषण कर रहे थे तो उन्हें सीता के धर्म परिग्रह का वृत चारणों से ज्ञात हुआ था(सुन्दरकाण्ड 44 सर्ग 29) ,चारणों ने ही सीता के कुशल वृत के मंगल संवाद से संतप्त हनुमान के संताप को नष्ट किया था।

>पंचम् वेद महाभारत में भी चारण जाति के प्रसंग उल्लेख हुए है (आदि पर्व 126/11 ) अर्जुन ने इन्द्र से अनुमति प्राप्त कर सिद्ध चारण से शासित लोक में जाकर पांच वर्षों तक शस्त्र विद्या का अभ्यास किया था।

> *यजुर्वेद* में चारण शब्द का प्रयोग ऋचा में हुआ है, यजुर्वेद अध्याय 6, मंत्र 2 -
*"यथोमां वाच कल्याणी मानवदानि जनेभ्य:*
*राजन्याभ्यां शूद्राय चार्चाय च स्वत्व चारणयं"*
 इस ऋचा में चार वर्णों से पृथक उस चारण शब्द का उल्लेख यह बतलाता है कि इन चार वर्णों से भिन्न उद्गम वाली यह एक विशिष्ट जाति थी।

> ईसके अतिरिक्त
पद्मपुराण,गणेशपुराण,आदीत्यपुराण,
विष्णुपुराण,शीवमहापुराण,स्कन्दपुराण,
मत्स्यपुराण,ब्रह्मपुराण,वायुपुराण,
वामनपुराण,
भविष्यपुराण,मार्कण्डेय पुराण,विष्णुपुराण,
गर्गसंहिता,मनुस्मृति,अमरकोष,
हलायुधकोष,अष्टाध्यायी,नालन्दाविशाल
शब्दसागरकोष,भगवदगोमंडल,कालीदासकी रचनाओ,हर्ष चरीत्र,प्रसन्नराघव,राजतरंगिणी,अनर्ध राघव,पृथ्वीचन्द्र चरीत्र ईत्यादी जैसे प्राचीन महान ग्रंथो मे, और तो और बहोत से जैन ग्रन्थो मे भी चारणो के बारे में दिया गया उल्लेख ध्यान देने लायक है ।

चारणो का शस्त्र-शास्त्र,पर असाधारण अधीकार था,
अपीतु चारण क्षत्रीय वर्णस्थ माने जाते है।

*जीगर बन्ना थेरासणा

टोकरा गाँव का ईतीहास (ठीकाना)

*टोकरा गाँव का ईतीहास(ठीकाना)*

*शाख:-सौदा बारहठ*

जामनगर(सौराष्ट्र) के खौङ गाँव के चक्खङा शाखा के नरहा चारण के घर 13वीं सदी में एक कन्या का जन्म हुआ। जन्म के समय ही मुँह में दाँत होने के कारण ब्राह्मणों ने इसे अनिष्टकारी व अमँगलकारी बताया। भयवश इस कन्या को बूर(गाङ) दिया गया। ये सब करने के 15 दिन बाद यह कन्या जीवित मिली। इस चमत्कार के बाद यह कन्या आमजन के बीच बूरुङी(बिरवङी) नाम से शक्ति रूप में पूजित हुई।

चारणों की २४ मूल शाखाओं में 'मरुत' नाम की शाखा है; जिसकी 'पेटा' नाम की उपशाखा है। पेटा की ५२ उपशाखाओं में से एक कापल(कायपल) है। कायपल उपशाखा में आदिपुरुष के नाम से 'देथा' उपशाखा चली। माँ बिरवङी जी का विवाह इसी देथा उपशाखा के 'भूयात जी अथवा करमसेण जी' (अलग-अलग विद्वानों के मतानुसार) जो कि बनासकांठा क्षेत्र में 'संखङो' ग्राम का स्वामी था, से हुई।

सीसोदे गाँव के गुहील राजा 'हम्मीर' उस समय अपने पूर्वजों का मेवाङ राज्य पुन: प्राप्त करने के लीए संघर्ष कर रहे थे; जो कि १३०३ ईस्वी में अल्लाऊद्दीन खिलजी द्वारा हथिया लिया गया था।
हम्मीर ने माँ बिरवङी जी की शरण प्राप्त की। माँ बिरवङी ने हम्मीर को विजय वरदान दिया और अपने पुत्र बारू देथा को 500 घोङों सहित हम्मीर की मदद के लिए भेजा।
बारू ने हम्मीर को वचन दिया कि विजय प्राप्त होने पर वह हम्मीर को 500 घोङे मूल्य के बदले देगा। और यदि पराजय होती है, तो ये 500 घोङे हम्मीर को बिना किसी मूल्य के भेंट कर देगा। उक्त सौदे के कारण बारू; 'बारू सौदा' के नाम से जाना गया और आज भी इसके वंशज *'सौदा'*उपटंक से जाने जाते हैं। विजयोपरांत हम्मीर ने बारू को अपना 'गढपति' और 'दसोंदी' बनाया; बैठक की ताजीम, 7 हाथी, 500 घोङे, पैरो मे सोने के लंगर,सैंकङों ऊँट व गाय-भैंसें, अतुल्य स्वर्ण भँडार व 12 गाँवों की सोना नीवेस जागीर  अर्पित कर पग-पूजा की तथा अपने वंशजों को सौदा चारणों से कभी ना विरचने(विमुख होने) की सौगंध दिलवाई।


हम्मीर से ही मेवाड के शासको को राणा बीरुद प्राप्त है ।

राणा हम्मीर ने चित्तौङ के कीले में माँ बिरवङी जी का भव्य मंदिर बनवाया। आज भी हम्मीर के सिसोदिया वंशज माँ बिरवड़ी जी को बिरवड़ी माँ, बाण माता, अन्नपूर्णा आदि नामों से कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
बारू सौदा कालांतर में राणा हम्मीर के साथ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। इसी बारू की कुल परंपरा में सौदा पालम, सौदा बाजूड़, सौदा जमणा, सौदा अमरसिंह, सौदा नरू, सौदा जैसा, सौदा केशव ओनाडसिंह ,कृष्णसिंह ,केशरीसिंह,जोरावरसिंह,प्रतापसिंह सहित और भी बगोत से विर सौदा सिरदारों ने मेवाड़ी स्वातंत्र्य और स्वाभिमान की रक्षा हेतु कई युद्धो मे भाग लेकर वीरगति का वरण किया।

बारु सौदा को राणा हम्मीर द्वारा प्राप्य उमराव पद और 12 गांवो की जागीरी मे से ही एक ठीकाना है *पाणेर*।
 बारुजी सौदा की 4थी  पीढी मे पाणेर के दीपसिंह सौदा को ईडर के राजा राव विरमदेव ने ईडर में हठोज गांव की जागीर एनायत की।
 श्री दीपसिंह जी के सुपुत्र ठाकुर देवीदानजी सौदा को 1657 चैत्र सुद 3 के दीन ईडर के राजा राव कल्याणमलजी ने *टोकरा* जागीर अर्पीत करके लाखपसाव देकर दरबार मे बैठक की ताजीम सम़्मान पूर्वक दी।

ठाकुर देवीदानजी अपने छोटे भाई को हठोज देकर  टोकरा मे स्थिर हुए।
फीर से ठाकुर साब को दांता के महाराजा वाघजी की और से राणोल की जागीर प्राप्त हुई थी।

ठाकुर साब ने कोई पाठशाला मे से शीक्षा प्राप्त नही की थी ,मां सरस्वती उनके कंठ मे थी। वे खुद गुजराती,मारवाडी,डींगल,और पींगल भाषाओ के प्रखर जानकार थे । उनके तीन पुत्र थे:
१)मेशदानजी,२)मेघसिंहजी,३)रघुनाथजी
ईडर और दांता राज्य के दरबार मे ठाकुर साब का स्थान उच्च और सन्मान भरा था । ईन दोनो राज्य से समय समय पर ठाकुर साब को पुरस्कृीत कीया जाता था ।
ठाकुर साब ने भक्ति रस मे बहोत से काव्य लीखे थे,पर उनका साहीत्य आज अप्राप्य है। ७० वर्ष की आयु मे ठाकुर साब देवीदानजी का स्वर्गवास टोकरा मे हुआ।
उनके वंशज टोकरा के जागीरदार है और चारण समाज मे खानदान कहलाते है।

ठाकुर साब देवीदानजी के वंशजो मे
बहोत से विद्धवान कवि और शूरविर हुए।

जीनके नाम नीम्न है:
ठाकुर ईन्द्रसिंह जी सौदा,
ठाकुर गोपालसिंह जी सौदा,
ठाकुर छत्रसिंह जी सौदा,
ठाकुर उमेदसिंह जी सौदा,
ठाकुर खुशालसिंह जी सौदा,
ठाकुर जसराजसिंह जी(जसजी) सौदा,
ठाकुर आईदान जी सौदा,
ठाकुर हरनाथ जी सौदा(हठोज)

साबरमती नदी के उपर नीर्माण होने वाले धरोई बांध के भराव क्षेत्र में टोकरा गांव आ जाने से इस ठीकाने के सौदा बारहठो को अन्यत्र जमीने सरकार श्री तरफ से एनायत की गई।

आज भी श्री ठाकुर साब देवीदान जी सौदा के वंशज उनकी उच्चतम ख्याती की गवाही देते हुए  मेवा-टोकरा,विरेश्वर-टोकरा,गढवी कंपा और हठोज ईत्यादी गांवो मे सोनानीवेस जमीनो के स्वामी है।

जय माँ बीरवडी जी
जय माँ करणी जी
जय माँ आवड जी

*जयपाल सिंह (जीगर बन्ना) थेरासणा*