क्षत्रिय चारण

क्षत्रिय चारण
क्षत्रिय चारण

गुरुवार, 25 मई 2017

चारणो के रीति रिवाज


राजपूताना के चारण और राजपुतो के रीति  रिवाज जिनकी जानकारी हमारे लिए  आवश्यक है।      
         
1.) अगर आप के पिता जी /दादोसा बिराज रहे है तो कोई भी शादी ,फंक्शन, मंदिर आदि में आप के कभी भी लम्बा तिलक और चावल नहीं लगेगा, सिर्फ एक छोटी टीकी लगेगी !!

2.) जब सिर पर साफा बंधा होता है तो तिलक करते समय पीछे हाथ नही रखा जाता, हां ,सर के पीछे हाथ तभी रखते है जब आप नंगे सर हो, तो सर ढकने के लिए हाथ रखें।

3.) पिता का पहना हुआ साफा , आप नहीं पहन सकते

4.) मटिया, गहरा हरा, नीला, सफेद ये शोक के साफे है

5.) खम्मा घणी  का असली मतलब है "माफ़ करना में आप के सामने बोलने की जुरत कर रहा हूं,  जिस का आज के युग में कोई मायने नहीं रहा गया है !!

6.) असल में खम्माघणी , दूसरे लोग राज्यसभा मे ठिकानेदार(जागीरदार) / राजा /महाराजा के सामने कुछ बोलने की आज्ञा मांगने के लिए use करते थे.

7.) ये सरासर गलत बात है की घणी खम्मा, खम्मा-घणी का उत्तर है, असल में दोनों का मतलब एक ही है !!

8)एक दूसरे को मिलने पर जय माताजी की बोलना ये पुरखों से चला आ रहा है ।

9.) पैर में कड़ा-लंगर, हाथी पर तोरण, नंगारा, निशान, ठिकाने का मोनो ये सब जागीरी का हिस्सा थे, हर कोई जागीरदार नहीं कर सकता था, स्टेट की तरफ से इनायत होते थे..!!

10.) मनवार का अनादर नहीं करना चाहिए, अगर आप नहीं भी पीते है तो भी मनवार के हाथ लगाके या हाथ में ले कर सर पर लगाके वापस दे दे, पीना जरुरी नहीं है , पर ना -नुकुर कर उसका अनादर न करे

11.) अमल घोलना, चिलम, हुक्का या दारू की मनवार, मकसद होता था, भाई, बंधु, भाईपे, रिश्तेदारों को एक जाजम पर लाना !!

12.)ढोली के ढोल को "अब बंद करो या ले जायो" नहीं कहा जाता है "पधराओ " कहते हैं।

13.) आज भी कई घरों में तलवार को म्यान से निकालने नहीं देते, क्योंकि तलवार की एक परंपरा है - अगर वो म्यान से बाहर आई तो या तो उनके खून लगेगा, या लोहे पर बजेगी, इसलिए आज भी कभी अगर तलवार म्यान से निकलते भी है तो उसको लोहे पर बजा कर ही फिर से म्यान में डालते है !!

14.) तोरण मारना इसलिए कहते है क्योकि तोरण एक राक्षश था, जिसने शिवजी के विवाह में बाधा डालने की कोशिश की थी और उसका शिवजी ने वध किया था

15.) ये कहना गलत है की माताजी के बलि चढाई, माताजी तो माँ है वो भला कैसे किसी प्राणी की बलि ले सकती है, दरअसल बलि माताजी के भेरू (शेर) के लिए चढ़ती है, उसको प्रसन्न करने के लिए.

*कुँ.जीगरसिंह थेरासणा*

शनिवार, 13 मई 2017

चारण कौन थे ?क्या थे ?


🔴 *चारण री बाता* 🔴
🔶  *चारण क्या थे?कौन थे ? (मध्य कालीन युग)*

अगर हम इतिहास मे एक द्रष्टि डाले तो पायेंगे की राजपूताना मे चारणो का इतिहास मे सदेव ही इतीहासीक योगदान रहा है । ये बहोत से राजघराणे के स्तम्भ रहे है । इन्हे समय समय पर अपनी वीरता एवम शौर्य के फल स्वरूप जागीरे प्राप्त हुई है ।
चारण राज्य मे  राजकवि ,उपदेशक एवम पथप्रद्शक होते थे । वह राजा के साथ युध्ध भूमि मे जाते थे एवम युध्ध मे राजा को उचित सलाह और धेर्य देते ,और अपनी वीरता युध्ध भूमि मे दिखाते थे ।वह राज्य के दार्शनिक ,राजकवि,रणभूमि के योद्धा और एक मित्र के रुप मे राज्य और राजा को सहयोग करते थे ,और राज्य की राजनीति मे भी उनका बड़ा योगदान रेहता था ।राजपूताना के राज्यों मे चारण एक  सर्वश्रेष्ठ,प्रभावशाली एवम महत्वपूर्ण व्यक्ति होते थे ।
जीवन स्तर : मध्य काल मे राजपूताना के चारण सभी प्रकार से सर्वश्रेष्ठ थे ।  राजघराने के राजकवि(मंत्री) और जागीरदार थे । उनके पास जागीरे थी उनसे जीवनयापन होता था ।

>राजपूताना से मिले कुरब कायदा -समान
चारणो को समय समय पर उनके शौर्यपूर्ण कार्य एवम बलिदान के एवज मे सन्न्मानीत किया जाता था ।जिनका विवरण इस प्रकार है :
1} लाख पसाव, 2} करोड़ पसाव ,3} उठण रो कुरब ,4} बेठण रो कुरब, 5}दोवडी ताजीम ,6} पत्र मे सोना 7}ठाकुर  8}जागीरदार

दरबार मे चारण  के बेठ्ने का स्थान छठा था ,सातवां स्थान राजपुरोहित का था । ये दो जातियाँ दोवडी ताजीम सरदारों मे ओहदेदार गिने जाते थे । चारण को दरबार मे आने  जाने  पर राज  दरबार  एवम राजकवि पदवी दोनो से अभी वादन होता था ।
चारण के कार्य :चारण राजा के प्रतिनिधि होते थे । चारण राजा को क़दम क़दम पर कार्य मे सहयोग करता था ।वह युद्ध मे बराबर भाग लेता और युध्धभूमि मे सबसे आगे खडा होता एवम शौर्य गान और  उत्साह से सेना व राजा को उत्साही करता और युद्ध भूमि मे अपनी वीरता दिखाते युद्ध करते । वह राजकवि के अतिरिक्त एक वीरयौद्धा और स्पष्टवक्ता होते थे । राजघराने की सुरक्षा उनका कर्तव्य था,राज्य के कोई आदेश अध्यादेश उनकी सहमती से होता था ।संकट समय पर राजपूत और राजपूत स्त्रीया  भी चारण के स्थान को सुरक्षित मान कर पनाह लेते थे ।
चारण कुल मे कई सारी देवियां हुई जो राजपूतो की कुलदेवीया है,ऐसी कोई राजपूत साख नही होंगी जिनकी कुलदेवी चारण न हो ।
देवलोक से आने से और कई  देवियां के जन्म से चारणो को (देवकुल) देवीपुत्र भी कहा जाता है । चारण कुल मे (काछेला समुदाय) मे देवियां हुई जो राजपूतों को राज्य प्राप्त करने मे मददरुप बने और राजपरिवार की कुलदेवियां हुई । और चारणो मे बहोत राजकवि ,वीरयोद्धा,स्पष्ट वक्ता हुए जो राजघराने के आधरस्तम्भ की तरह रहे । चारण का राजपूत से अटूट सम्बंध रहा है ।
अभीवादन :चारण अभिवादन "जय माताजी"से करते है,राजपूतो को जय माताजी कर अभीवादन करना चारण ने सिखाया है ।
>ठिकाणा व जागीरी: स्थिति - पुरातन समय में तो राजपुरोहित और चारण  राज्य के  सर्वोच्च एवं सर्वश्रेष्ठ अधिकारी होते थे  । मध्यकाल में युद्धो में भाग लेने, वीरगति पाने तथा उत्कृष्ठ एवं शौर्य पूर्ण कार्य कर मातृभूमि व स्वामिभक्ति निभाने वालो को अलग-अलग प्रकार की जागीर दी जाती थी । इसमें चारण ,राजपूत व  राजपुरोहित ये तीन जातियाँ मुख्य थी । प्रमुख ताजीमें निम्न थी -

1. दोवड़ी ताजीम
2. एकवड़ी ताजीम
3. आडा शासण जागीर
 (क) इडाणी परदे वाले
 (ख) बिना इडाणी परदे वाले
4. भोमिया डोलीदार
 (क) राजपूतो में भोमिया कहलाते
(ख) चारण  एवं राजपुरोहितो में डोलीदार कहलाते ।

राजपूत साधारण जागीरदार, पर चारण  व राजपुरोहित को सांसण (शुल्क माफ) जागदीरदार कहलाते थे।

रस्म रिवाज -
समस्त रस्मोरिवाज विवाह, गर्मी, तीज-त्यौहार, रहन-सहन, पहनावा इत्यादि राजपूतो व चारणो के समान ही है।

वर्तमान स्थिति :बदलते युग के थपेड़ो के बिच चारण की गौरवगाथा मात्र ऐतिहासिक घटनाओ पर रह गयी है । अल्प संख्यक समाज है राजस्थान ,गुजरात कुछ भाग मे,मध्यप्रदेश के कुछ भाग मे चारणो की संख्या है ।सरकारी नोकरी मे चारण को जाना ज्यादा पसंद है ।कुछ चारण निजी व्यवसाय एवम खेती पर निर्भर है । देश की तीनो सशस्त्र सेना एवम सुरक्षा कर्मियों आदि नोकरी करनी ज्यादा पसंद करते है । देश भक्त एवम वफादार है । आज भी कुछ कुछ चारण काव्य रचते है ।
उपसंहार - स्पष्ट है कि पुरातन एवं मध्यकाल में चारणो, राजपुरोहितो एवं राजपूतो का चोलीदामन का प्रगाढ़ रिश्ता रहा है। सांस्कृति दृष्टि (रीति-रिवाजो) से ये कभी भिन्न नहीं हो सकते । एक दूसरे के अभिन्न अंग की तरह है। इतिहास साक्षी है - पुरातन समय में  चारणों ने समय-समय पर राजपूतो को कर्तव्यपालन हेतु उत्साहित किया । उन्होने काव्य में विड़द का धन्यवाद दिया एवं त्रुटियों पर राजाओं को मुंह पर सत्य सुनाकर  पुनः मर्यादा एवं कर्तव्यपालन का बोध कराया । रणभूमि मे शौर्यता और वीरता दिखा कर  कई युध्ध मे जीत हासिल की । किन्तु समय के दबले करवटों के पश्चात् देश आजाद होने  के बाद ऐसा कुछ नहीं रहा एवं धीरे-धीरे मिटता गया ।
संदर्भ :
⚫प्राचीन भारतीय इतिहास -dr. वी.एस.भार्गव
⚫भारतीय संस्क्रुति का विकास क्रम-एम.एल माण्डोत
⚫राजपुरोहित जाती का का इतिहास -प्रहलादसिंह राजपुरोहित
⚫चारण की अस्मिता -लक्ष्मणसिंह पिंगलशी  चारण


उपरोक्त पुस्तकों का निचोड़ कर के एवम  अपनी मौलिकता और इससे अतिरिक्त अन्य शब्द सामग्री का भी प्रयोग किया है ।आशा है समाज के प्रत्येक वर्ग को और अन्य समाज को भी  चारण ज्ञाति की रुचिकर एवं नई जानकारी  प्राप्त होगी ।
          *आभर*
     *"जय माताजी री"*
*कुँ.जीगरसिंह चारण (सिंहढायच)*
*ठी.थेरासणा (ईडर)*

सोमवार, 16 जनवरी 2017

दानेश्वरी चारण

मेवाड के राजकवि और मारवाड के मोघडा गाँव के श्री ठा.सा.हरीसिंहजी अचणदानजी सिंहढायच को मेवाड के राणा जगतसिंहजी(प्रथम)ने लाखपसाव से सन्मानीत कीया था| तब उसी समय कविराज ने दरबार में ब्राह्मण, भाट,राजकमँचारीओ को दे दीया था|
>यही कविराज को अकबर के नो रत्नों मे से एक राजा टोडरमलजी ने उदयपुर राज्य कविराज के चरणों मे अर्पित कीया था(उस समय उदयपुर अकबर के क्बजे मे था)  पर कविराज ने राज्य का अस्वीकार कीया और वापस कीया| पर टोडरमलजी के अती आग्रहवश हो कर कविराज ने कई गांव ब्राह्मण को दान मे दे दीये थे| तब का एक दोहा है:
 "दान पाये दोनो बढ़े, का हरी का हरनाथ,
उन पढ लंबे पद दीये, ईन बन लंबे हाथ"|
दानेश्वरी चारण >10.3
 पृ.222 >चारण नी अस्मीता

 Type By:कुँ.जीगरसिंह सिंहढायच

थेरासणा गाँव का इतिहास(ठीकाना)

*थेरासणा गाँव का इतिहास (ठीकाना)*
🗡🗡

ई.स.1745 में
मेवाड की राजधानी उदयपुर के सींहासन पर महाराणा जगतसिंहजी बीराजमान थे। उस समय उदयपुर के राजकवि  ठाकुर गोपालदासजी सिंहढायच थे। बडे ही शुरविर, वीध्वान और सत्यवक्ता चारण थे।  कुम्भलगढ से थोडी दुरी पर एक ठीकाना मण्डा के वह ठाकुर थे।

मेवाड की दक्षीणी सीमा पर ईडर राज्य स्थित है। वह जोधपुर (मारवाड) के राठोडो के अंतरगत राज्य था । राजा राव कल्याणमलजी ईडर की गद्दी पर बीराजमान थे।
ईडर राज्य मे एक महानपरोपकारी चारण सांयाजी झुला राज्य के राजकवि थे ।ईडर दरबार के ख्यातनाम व्यक्तित्व थे, पुरे भारतवर्ष मे उनकी ख्याती थी। सायांजी ईडर से उतरदीशा मे श्री भवनाथजी मंदीर के पास जागीर गाँव कुवावा के स्वामी थे | वे बहोत बडे वीध्वान संत और कृष्ण भक्त थे। ईडर राज्य के महापुरुष सांयाजी को सभी राजनैतीक कार्य कल्याणमलजी पुछ कर करते थे। कल्याणमलजी सायांजी को अपने आदर्श मानते थे।

  एक दीन सायांजी अपने स्वपन के अनुसार जलसमाधी लेने हेतु व्रजभुमी जाने को रवाना हुए, जब राव कल्याणमलजी को ये बात की खबर हुई की सांयाजी मुझसे मीले बगैर जल समाधी को सीधा रहे है, तभी कल्याणमलजी सांयाजी को अंतीम बार भेट करने हेतु ईडर से ब्रज को रवाना हुए | राजा को रास्ते मे ही खबर मीली की सांयाजी ने नदी मे जल समाधी ले ली, और देवगती को प्राप्त हुए है। राजा कल्याणमलजी के पैरो तले जमीन खीसक गई ! उनकी सांयाजी से आखरी बार मीलने की ईच्छा अधुरी रहे गई । वो बडे ही नीराश होकर ईडर लोटने को रवाना हुऐ।
रास्ते मे राव कल्याणमलजी का ननीहाल उदयपुर आया वे उदयपुर पहोंचे | उन्होने श्री सांयाजी झुला की सारी बात महाराणा जगतसिंह को बताई, कहा की एक महान सीतारे की ईडर को खोट हुई। मुझे राज्य के लीए एक कुशळ और विध्वान चारण की आवश्कयता है। जगतसिंह ने बडा ही खेद व्यकत कीया और उनके खास मित्र ,समर्थ वक्ता और वीध्वान
उदयपुर के राजकवि ठाकुर गोपालदासजी सिंहढायच को राजा राव कल्याणमलजी के राज्य ईडर जाने का नीर्देश ईस शर्त पे कीया की ,ईडर मे सबसे ज्यादा आय वाले ठीकाने की जागीर गोपालदासजी को प्रदान की जाए | राव कल्याणमलजी ने शर्त मंजुर की।

ठाकुर गोपालदासजी राव कल्याणमलजी के साथ ईडर पहुचे। राजा कल्याणमलजी ने बडे मान सन्मान के साथ गोपालदासजी को ईडर के राजकवि पद पर सुशोभीत कर अपने दरबार मे आदर पूर्वक स्थान दीया। राज्य के कुरब कायदे, लाख पसाव और *थेरासणा*,वडाली ,रामपुरा एवं थूरावास ये चार गाँव की जागीरी एनायत की।उस समय पूरी ईडर रियासत मे सबसे ज्यादा आवक /आय (25,000-30,000/मास) इस चार गाँव की थी |

 गोपालदासजी के साथ
 एक दुसरा चारण परीवार भी मेवाड से ईडर आया था, उस चारण को ठाकुर गोपालदासजी ने थुरावास गांव की जागीरी प्रदान की।

कुछ सालो के बाद ठाकुर गोपालदासजी का स्वर्गवास हुआ।
एकदीन उन्ही के पुत्र ठाकुर राजसिंहजी ईडर की शाही सवारी मे दरबारगढ़ जा रहे थे । सवारी मेबहोत से सीपाही और दरबारी थे, तब उसी वक़्त वडाली के एक जैन व्यापारी ने मोका देख कर कहा," ठाकुर साब अपना हिसाब कब चुकता करोगे" राजसिंहजी को ईस बात से बहोत गुस्सा आया, वो दूसरे ही दिन जैन के पास गये और कहा की " चार गांव के ठाकुर को दरबार सवारी मे एसा केह ने की तुमारी हींमत कैसे हुई " ईतना केह कर कटार निकाल कर जैन की हत्या कर दी ।

 जैन के परिवार वाले ईडर दरबार मे बदला लेने पहुँचे। राजा को सारी बात बताई, राजा ठाकुर साब को कुछ कर तो नही सकते ,उनके मीत्र ,राजकवि , ठाकुर और दरबारी थे ,तो राज्य के नीयम और न्याय के तौर पर राजा ने वडाली और रामपुर की जागीर खाल्सा कर दी।

 गोपालदासजी ने जमीन के अंदर एक चार मंजिल की कोतरणी युक्त बावडीया का नीर्माण करवाया था ,जो आज रामपुरा मे स्थीत है,और उसी बावडी मे श्री विरसिंहजी बावजी की दीवार के अंदर मुर्ती भी वीध्यमान है।

फीलहाल आज ठाकुर गोपालदासजी सिंहढायच के वंशज थेरासणा के जागीरदार है | और वह चारणकुल में खानदान कहलाते है ।

*संदर्भ >*
*फार्बस रासमाला*
*- एलेकजांडर फार्बस*
*राव वीरमदेव*
*पृष्ठ:677-78*


*जयपाल सिंह (जीगर बन्ना) थेरासणा*

सिंहढायचो का इतिहास

*सिंहढायचों का इतिहास*
🦁🗡


एकबार जोधपुर रियासत के राजा नाहङराव पडीहार  कहीं से अकेले ही आ रहे थे अरावली की पहाङियो से होते हुवै । गर्मी का मौसम भरी दोपहरी का समय तेज तावङो तपती घरा लाय रा थपिङा बावै । राजा जी नै रास्ते मे जोरदार प्यास लग गयी । दुर दुर तक पानी नहीं । गलो होठ सागेङा सुकग्या अंतस तकातक सुक गयो । आथङता 2 राजा जी डुंगरा री ढाल सुं नीचे आया उठै गाय रो खूर सुं खाडो पङियोङो जिणमे 2 - 4 चलू बरसात रो पाणी ठेरियोङो हो प्यासा मरतां थका नी आव देखयो नी ताव चलू भरनै खाताक सुङका लिया अर पानी पिवतां ई राजा रै हाथां मे कोढ (कुस्ट रोग ) जकी झङगी । अर सरीर मे एकाएक ताजगी आयगी । राजा देखयो आ कोई चमतकारी तपो भूमि है ।अठै सरोवर खुदाणो चहिजै ।
राजा बी जगां सरोवर खुदाई सुरु करावै पण ज्यां दिन रा खोदे पण रात वहैतां ई पाछो पैली हतो जङो व्है जावै । अर्थात बुरीज जावै काफी प्रयास करनै के बावजुद भी तालाब खोद नही पाते फिर राज विद्वानो गुणी व्यक्ति यों से।पुछवाता है ऐसा क्यो हो रहा हैं । तब बात सामनै आती हैं कि पैहले यहां बहुत बङा तालाब था इसके किनारै एक तपस्वी साधु का यहां आश्रमं था जिसकी बहुत सी गांये थी । अरावली की पहाङियो में शेर रहते थे वे तालाब में पानी पिने आते थे और कई बार ऋषिं की गायो को खा जाते थे इस कारण ऋषि इस तालाब को श्राप देकर यहां से चला जाता है और श्राप देता हैं कि इस तालाब में पानी नहीं ठेहरेगा । इस कारण ऐसा होता हैं पर राजा नाहङराव नै तो तय कर लिया था कि तालाब तो खुदाना ही हैं ।तब बङे बङे पंडित  विद्वानों से पता किया की इस श्राप का तोङ क्या है तब किसी ब्राह्मण देवता ने बताया जिसने सैकङो शेर मारे हुवै हो उसी के हाथो से तलाब खुदाई की नींव रखे तभी कार्य सम्भव हो पायेगा। तब यह समस्या आई की सैकङो शेर कौन मारे ऐसा आदमी कहा मिलेगा तब पता करते करते नरसिंहजी भाचलिया का नाम सामने आया पर उस समय वह गुजरात के गिर कि तलहटी में {जाखेङा गांव_दयालदास री ख्यात}और {चारण बिजाणंद सिंहढायच सैणी चारण री वात मे गुजरात रौ भाछली गांव भी बतावे} थे। नरसिंह जी के  पिता को शेर नै मार दिया था। (नरसिंह जी बहोत तेज मगज के थे)
जिस कारण उनको शेरो पर गुस्सा आया और उसी वक्त जल लेकर प्रण ले लिया की जब तक यहा के सारे शेरो को नही मार दु तब तक अन्न मुंडे में कोनी लुं  इस तरह वह रोज शेर को मारकर ही भोजन करते थे उन्होने सैकङो शेर मारै हुवै थे। नाहङराव  उनको  आग्रह कर  अजमेर पुस्कर ले आये और उस के बाद पुस्कर तालाब की खुदाई आरम्भ की नरसिंह भाचलिया के पुस्करणा ब्राह्मणो ने मिल कर तालब खोदा । नरसिंहजी को नाहङराव ने पेहला  मोगङा गांव जागीरी में दिया।सैकङो शेर मारनै के कारण नाहड़राव ने  नरसिंहजी भाचलिया को सिंहढायक की उपाधी दी।
(सिंह+ढायक) {ढानै वाला,मारने वाला,पाङनै वाला} सिंहढायक से अपभ्रंस में  सिंहढायच हो गया) मोगङा से ही अनेक राजाओ से अनेक जागीरे प्राप्त की।
 सिंहढायच जोधपुर,बीकानेर, मेवाङ,जयपुर, ईडर ,नरसिंहगढ(मध्य प्रदेश)जेसे स्टेटो मे राजघराने के मंत्री सदस्य और राजकवि पद पर थे ।सिंहढायचो मॆ कई बड़े बड़े शूरवीर,विध्वान और कविराज हो गये ।

*जीगर बन्ना थेरासणा*